Sunday, February 5, 2017

बंगाल पुलिस की नजर में आतंकवादी हैं सिख ?

कोलकाता, 5 फरवरी (जनसत्ता)।
बीते 30-32 साल के दौरान देश में पता नहीं कितना परिवर्तन आ चुका है, राज्य में इस दौरान तीन दशक से सत्ता कर रही वामपंथी सरकार का जमाना गुजरे दिनों की बात हो चुका है। अब यहां आधुनिकता और विकास की बात करने वाली मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस सरकार का शासन छह साल से चल रहा है। लेकिन पुलिस का आलम यह है कि वही पुराने ढर्रे पर चल रही है। केंद्र में कांग्रेस की सरकार का बहुमत जाने और मिली जुली सरकारों के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा की सरकार के गठन के बाद रवैये में फेरबदल हुआ है। बंगाल में पुलिस का सिखों के प्रति नजरिया नहीं बदला है। इसलिए कई सिखों की ओर से आरोप लगाया जाता है कि पुलिस वाले अब भी उन्हें आतंकवादी मानते हैं।
गौरतलब है कि बीते साल भवानीपुर के खालसा स्कूल में अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य के साथ हुई बैठक में कई सिखों ने आरोप लगाया था कि पासपोर्ट बनवाने में पश्चिम बंगाल में भारी परेशानी होती है। जबकि बिहार, ओडिसा, उत्तर प्रदेश, पंजाब,दिल्ली , हरियाणा समेत दूसरे राज्यों में ऐसे नहीं होता है। 1984 में जब पंजाब में विभिन्न मांगों को लेकर अकाली दल आंदोलन कर रहा था, तत्कालीन प्रधानमंत्री की हत्या के बाद सिखों पर अलगाववादी होने का ठप्पा लगा दिया था। पुलिस मुकाबलोौं से बचने के लिए लोग विदेश जाने लगे थे। इस दौरान विदेश जाने वाले सिखों के लिए कई तरह के नियम-कानून बनाए गए थे। आरोप है कि सिखों की काली सूची भी बनाई गई थी। अब केंद्र और पंजाब में अकाली-भाजपा सरकार है और हालात बदल चुके हैं। लेकिन बंगाल में लगता है कि हालात नहीं बदले हैं।
हावड़ा जिले के सांकराईल थाना इलाके में एक सिख पति-पत्नी ने 10 जनवरी को पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। हावड़ा जिले में ही  शिवपुर थाना इलाके की एक मुस्लिम युवती ने 12 जनवरी को पासपोर्ट के लिए आवेदन किया था। मुस्लिम महिला को जनवरी में ही पासपोर्ट मिल गया, लेकिन सिख दंपत्ति की अभी तक पुलिस वेरिफिकेशन भी क्लीयर नहीं हुई। हालांकि पुलिस वाले एक हजार रुपए से ज्यादा डकार चुके हैं।
इस बारे में सांकराईल थाना के एक डीआइबी अधिकारी का कहना है कि सिखों के लिए पासपोर्ट बनाना आसान नहीं है। इसके लिए बहुत सारी जांच होती है। फाईल पुलिस थाने, डीआइबी समेत कई जगह जाती है। जब उनसे यह कहा गया कि पुलिस का काम कागजात की जांच करना नहीं, सिर्फ यह देखना है कि पासपोर्ट बनाने वाला व्यक्ति उस इलाके में रहता है या नहीं और उसके खिलाफ कोई आपराधिक रिकार्ड है या नहीं, इसका ब्योरा देना है। उनका कहना था कि सिखों के मामले में ऐसा नहीं है। यह यह पूछा गया कि इस बारे में कोई लिखित निर्देश आपसे पास है, उनका कहना था कि सालों से ऐसे ही चल रहा है। इस बारे में आप उच्चाधिकारियों से बातचीत कर सकते हैं।
राज्य अल्पसंख्यक आयोग के सदस्य गुरबख्स सिंह से जब यह पूछा गया कि क्या वास्तव में सिखों के लिए पासपोर्ट जांच के लिए अलग कानून है? उनका कहना था कि ऐसा तो नहीं है। उन्होंने बताया कि ऐसी कुछ शिकायतें पहले भी मिली हैं, इस बारे में उच्च स्तर तक पड़ताल की जाएगी। उन्होंने कहा कि अगर सिखों के साथ भेदभाव का रवैया अपनाया जाता है, तब यह बहुत गलत  बात है। ऐसी बातों को किसी भी हालत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। 

Monday, August 10, 2015

भारत में हैं अठारह सौ से अधिक राजनीतिक दल


 प्रेट्र : राजनीतिक दलों की वादा खिलाफी उपजी निराशा के दौर से गुजर रहे भारत में चुनावी पार्टियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। मार्च 2014 से इस वर्ष जुलाई के बीच चुनाव आयोग में करीब 239 संगठनों ने खुद को राजनीति दल के रूप में दर्ज कराया है। नए संगठनों के दर्ज होने के बाद देश में राजनीतिक दलों की संख्या 1866 हो गई है।1आयोग के मुताबिक, इस वर्ष 24 जुलाई तक उसके यहां 1866 राजनीतिक दल दर्ज हो गए थे। इनमें से 56 को पंजीकृत राष्ट्रीय या राज्य पार्टियां की मान्यता मिली। शेष ‘गैर मान्यता प्राप्त’ के रूप में पंजीकृत हुई हैं। आयोग द्वारा तैयार आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 464 राजनीतिक दलों ने अपने प्रत्याशी उतारे थे।1आयोग का आंकड़ा संसद में इस्तेमाल करने के लिए कानून मंत्रलय को सौंपा गया था। मंत्रलय का विधायी विभाग चुनाव आयोग के लिए प्रशासनिक इकाई है।1चुनाव आयोग ने बताया है कि 10 मार्च 2014 तक देश में 1,593 राजनीतिक पार्टियां थीं। 11 मार्च से 21 मार्च के बीच 24 और दल पंजीकृत हुए। 26 मार्च तक 10 और संगठनों ने राजनीतिक दल के रूप में खुद को पंजीकृत कराया। ये राजनीतिक दल 5 मार्च को लोकसभा चुनाव घोषित होने के बाद सामने आए। पिछले वर्ष चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दलों की कुल संख्या 1,627 हो गई थी।1पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त दलों को नहीं मिलेगा स्थायी चुनाव चिन्ह : पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को उनके अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने की विशेषाधिकार नहीं होगा। उन्हें उपलब्ध फ्री चुनाव चिन्हों में से किसी को चुनना होगा। ऐसे उपलब्ध फ्री चुनाव चिन्हों की संख्या 84 है।1नई दिल्ली, प्रेट्र : राजनीतिक दलों की वादा खिलाफी उपजी निराशा के दौर से गुजर रहे भारत में चुनावी पार्टियों की संख्या निरंतर बढ़ती जा रही है। मार्च 2014 से इस वर्ष जुलाई के बीच चुनाव आयोग में करीब 239 संगठनों ने खुद को राजनीति दल के रूप में दर्ज कराया है। नए संगठनों के दर्ज होने के बाद देश में राजनीतिक दलों की संख्या 1866 हो गई है।1आयोग के मुताबिक, इस वर्ष 24 जुलाई तक उसके यहां 1866 राजनीतिक दल दर्ज हो गए थे। इनमें से 56 को पंजीकृत राष्ट्रीय या राज्य पार्टियां की मान्यता मिली। शेष ‘गैर मान्यता प्राप्त’ के रूप में पंजीकृत हुई हैं। आयोग द्वारा तैयार आंकड़े के अनुसार, वर्ष 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में 464 राजनीतिक दलों ने अपने प्रत्याशी उतारे थे।1आयोग का आंकड़ा संसद में इस्तेमाल करने के लिए कानून मंत्रलय को सौंपा गया था। मंत्रलय का विधायी विभाग चुनाव आयोग के लिए प्रशासनिक इकाई है।1चुनाव आयोग ने बताया है कि 10 मार्च 2014 तक देश में 1,593 राजनीतिक पार्टियां थीं। 11 मार्च से 21 मार्च के बीच 24 और दल पंजीकृत हुए। 26 मार्च तक 10 और संगठनों ने राजनीतिक दल के रूप में खुद को पंजीकृत कराया। ये राजनीतिक दल 5 मार्च को लोकसभा चुनाव घोषित होने के बाद सामने आए। पिछले वर्ष चुनाव आयोग में पंजीकृत राजनीतिक दलों की कुल संख्या 1,627 हो गई थी।1पंजीकृत गैर मान्यता प्राप्त दलों को नहीं मिलेगा स्थायी चुनाव चिन्ह : पंजीकृत लेकिन गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों को उनके अपने चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ने की विशेषाधिकार नहीं होगा। उन्हें उपलब्ध फ्री चुनाव चिन्हों में से किसी को चुनना होगा। ऐसे उपलब्ध फ्री चुनाव चिन्हों की संख्या 84 है।

Thursday, July 16, 2015

महीना बदलते ही एक साथ बदल जाएगी 50 हजार से ज्यादा लोगों की नागरिकता


 छिट महल के  दूसरी ओर का अपना सारा कुछ छोड़ कर यहां आने पर कई लोगों को संयश  है। कई लोग शरणार्थी शिविर में रहने की सोच कर ही चिंता में हैं। मालूम हो कि 31 जुलाई आधी रात के बाद 51 बांग्लादेशी छिटमहल भारत का हिस्सा बन जाएगा। इसके साथ ही भारतीय इलाके के 111 छिट महल बांग्लादेश के हो जाएंगे। इतना ही नहीं कुल मिलाकर 51584 लोगों की नागरिकता भी अगले महीने से बदल जाएगी।
एक साथ 50 हजार से ज्यादा लोगों की नागरिकता बदली जानी एक  विलक्षण घटना तो है ही, इसके साथ ही दूसरे देश को लेकर विभिन्न आशंकाएं भी हैं। देश-विदेश के मीडिया घटना पर नजर रख रहे हैं। सरकार की ओर से दस दिन पहले शिविर खोला गया था, जहां लोग अपनी नई नागरिकता के बारे में नाम-पता दर्ज करवा रहे हैं। हाल तक 51 बंगलादेशी इलाके में रहने वाले 14 हजार 14 हजार 215 लोगों ने नाम दाखिल कर दिए हैं। यह सारे भारतीय नागरिकों का 98 फीसद है।
सरकारी आंकड़ों का कहना है कि किसी भी भारतीय नागरिक ने बांग्लादेशी इलाके में रहने की इच्छा नहीं जताई है। सालों से रहने वाली भूमि का मोह  त्याग कर वे लोग भारतीय इलाके में रहने के लिए खुश हैं। लेकिन दो फीसद लोगों का क्या? क्या वे बांग्लादेश में रहना चाहते हैं? छिटमहल बिनिमय समन्वय कमेटी के नेताओं का कहना है कि ऐसी कोई बात नहीं है। कुछ लोग बाहर हैं तो कुछ बीमार हैं। समयसीमा पूरी होने से पहले सभी भारत में जाने के लिए सारी औपचारिकताएं पूरी कर लेंगे।
इसी तरह के हालात भारतीय इलाके में रहने वाले बांग्लादेशी नागरिकों की है। 37 हजार 369 (94 फीसद) लोगों ने अपने वतन जाने की सहमति प्रदान कर दी है। बताया जाता है कि यहां रहने वाले तकरीबन एक हजार हिंदू भारतीय इलाके में ही बांग्लादेशी नागरिक बनकर रहना चाहते हैं।
सूत्रों का कहना है कि 1127 लोगों ने पश्चिम बंगाल में रहने के लिए कहा था, अब 107 लोगों ने अपना फैसला बदल लिया है। कई और लोग भी अपने वतन जाने के बारे में सोच कर पत्र लिखने की योजना बना रहे हैं।
सरकारी अधिकारियों का कहना है कि तकरीबनएक हजार बांग्लादेशी नागरिक भारत में रहना चाहते हैं  क्योंकि यहां सुरक्षा और काम के ज्यादा अवसर मौजूद हैं। माना जा रहा है कि भारतीय नागरिक के तौर पर उन्हें ज्यादा सुविधा मिलेगी। इसमें पुनर्वास के लिए भारी रकम मिल सकती है।
सूत्रों का कहना है कि एक गुट चाहता है कि लोग बांग्लादेशचले जाएं तो दूसरा गुट चाहता है कि वे लोग यहीं रहें। इसका कारण कुछ लोग उनकी जमीन सस्ते में खरीदना चाहते हैं जबकि जमायत ए इस्लाम से जुड़े लोगों का मानना है कि बांग्लादेश की नागरिकता लेने से इंकार करने पर वहां की सरकार की किरकिरी होगी।
हालांकि कमेटी के नेता दीप्तिमान सेनगुप्ता का कहना है कि भारतीय छिटमहल में रहने वाले गरीब लोगों ने मतलबी लोगों की पहचान कर ली है। ज्यादातर लोगों ने पहले ही बांग्लादेश जाने की इच्छा जाहिर करके उनके सपनों को चकनाचूर कर दिया है। भात में आने की सोचने वाले भी अब वहां जाने की बात कर रहे हैं।

Sunday, July 5, 2015

सांसदों की तरह विधायकों के कब आएंगे अच्छे दिन




कोलकाता, 5 जुलाई । सांसद कोटे की रकम बढ़े बहुत अर्सा बीत चुका है। अब उनका वेतन और पेंशन वृद्धि की चर्चा चल रही है। माना जा रहा है कि इसमें भी भारी वृद्धि होने वाली है। इससे राज्य के  विधायकों में असंतोष बढ़ रहा है। चार साल पहले तृणमूल कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने विधायकों के भत्ते में मामूली वृद्धि तो हुई लेकिन विधायक कोटे में वृद्धि नहीं हुई। कई विधायकों का कहना है कि विधायक इलाका विकास फंड में तो वृद्धि हुई ही नहीं, मूल वेतन में भी वृद्धि नहीं हुई है। तृणमूल विधायक हों, कांग्रेस या माकपा के सभी का मानना है कि महंगाई के दौर में इलाका विकास फंड में वृद्धि नहीं की गई तो काम करना मुश्किल है।
सूत्रों का कहना है कि महंगाई से हालत ऐसे हो गई हैं कि एंबुलेंस खरीदने के लिए रकम देते हैं तो रास्ते की मरम्मत का काम रुक जाता है। दोपहर के भोजन के लिए स्कूलों में रसोई घर बनाने के लिए रकम दी जाती है तब पेय जल परियोजना का काम बंद हो जाता है। एक मद में रकम खर्च करने पर दूसरे मद में रकम नहीं बचती है। एमएलए लैड में वृद्धि की आवश्यकता को लेकर सभी दलों के विधायक सहमत हैं। इस बारे में विधानसभा की स्टैंडिंग कमेटी ने दो साल पहले सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित किया था। राज्य के परियोजना और विकास मंत्री रछपाल सिंह भी बैठक में उपस्थित थे और उन्होंने भी माना कि वृद्धि आवश्यक है। लेकिन इस बारे में वित्त विभाग में मंजूरी नहीं दी, जिससे वृद्धि का प्रस्ताव अधर में लटक गया।
वरिष्ठ कांग्रेस विधायक मानस भूइयां का कहना है कि सांसदों के साथ विधायकों की तुलना मत करिए लेकिन देश के सभी राज्यों के विधायकों के मुकाबले पश्चिम बंगाल के विधायकों को सबसे कम रकम विधायक कोटे में मिलती है। मालूम हो कि राज्य के विधायक को एक साल में 60 लाख रुपए मिलते हैं जबकि झारखंड के विधायक को एक करोड़ 50 लाख, बिहार के विधायक को एक करोड़ 50 लाख, पंजाब के विधायक को दो करोड़ और कर्नाटक के विधायक को एमएलए लैड में एक करोड़ 50 लाख रुपए मिलते हैं। आखरी बार 2009-2010 में यह कोटा 50 लाख से बढ़ा कर 60 लाख किया गया था।
दूसरी ओर सांसद कोटे में कुछ साल पहले तक सालाना दो करोड़ रुपए मिलते थे, जिसे बढ़ाकर पांच करोड़ कर दिया गया है। अब सांसदों का मासिक वेतन दोगुना करने की सिफारिश की गई है। इससे राज्य के विधायकों और सांसदों में अंतर लगातार बढ़ता जा रहा है।
विधायक इलाका विकास फंड सबंधी स्टैडिंग कमेटी के अध्यक्ष खगेन मुर्मू का कहना है कि साल में 60 लाख रुपए कैसे खर्च करें कोई बताए तो? एक एंबुलेंस खरीदनेके लिए छह-सात लाख रुपए लगते हैं। किसी छोटे पुल की मरम्मत
करनी हो तो 10-15 लाख रुपए लग जाते हैं। दोपहर के भोजन के लिए स्कूल में रसोई घर बनवाना हो, उसके लिए पांच-छह लाख रुपए लग जाते हैं। एक सब-मर्सीबल पंप लगाने के लिए डेढ़ से दो लाख रुपए लगते हैं। अब क्या काम किया जाए और क्या नहीं, इसे लेकर ही चिंता रहती है।
माकपा विधायक अनीसुर रहमान का भी मानना है कि विधायक कोटे में वृद्धि की जानी चाहिए। तृणमूल कांग्रेस विधायक जटू लहिरी, निर्मल माझी समेत कई विधायकों ने भी वृद्धि का समर्थन किया है। मंत्री रछपाल सिंह मानते हैं कि वृद्धि जरुरी है, इसलिए कम से कम एक करोड़ रुपए कोटा करने की सिफारिश की गई थी। यह सिफारिश वित्त विभाग को भेज दी गई है।
इस तरह अब वृद्धि पर कोई फैसला वित्त मंत्री अमित मित्र पर निर्भर करता है। लेकिन पहले से आर्थिक संकट में गुजर रही सरकार इतनी वृद्धि कर भी सकेगी या नहीं, इसलिए माना जा रहा है कि प्रस्ताव ठंडे बस्ते में चला गया है। 

Sunday, June 21, 2015

गोद लेने वाले हजारों लेकिन घट रही है संख्या
कोलकाता, 21 जून
खगेंद्र राउत बीते 20 साल से कोलकाता के एक स्कूल में दरवान का काम कर रहा है। सालों पहले शादी हुई थी लेकिन अभी तक कोई संतान नहीं है। बच्चे के लिए बाबाओं से लेकर डाक्टरों तक खासी भागदौड़ करने के बाद किसी ने बच्चा गोद लेने के बारे में सुझाया। इस बारे में भी काफी प्रयास किए गए, सफलता नहीं मिली। एक बांग्ला टीवी चैनल में पत्रकारिता करने वाली एक युवती भी बीते 10 साल से बच्चे को तरस रही है,डाक्टरों से लेकर ओझाओं तक दौड़ने के बाद कई बच्चा गोद देने वाले एजेंसियों से भी संपर्क किया  लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। महानगर और आसपास ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो बच्चों के लिए तरस रहे हैं।  दूसरी ओर सरकारी आंकड़ें बताते हैं कि देश में गोद लेने की दर में 50 फीसदी गिरावट आई है।
मालूम हो कि देश में अलग अलग कारणों से मां नहीं बन पाने वाली महिलाओं की तादाद लगातार बढ़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक देश में  लगभग 15 फीसदी महिलाएं इस समस्या से जूझ रही हैं। महिलाओं में 1960 में प्रजनन क्षमता 6.1 थी, यह 2013 में घटकर 2.4 रह गई। जबकि 2012 में  बंगाल में यह आंकड़ा 1.7 पर पहुंच गया। पुरुलिया और पश्चिम मेदिनीपुर को छोड़कर जहां सभी जिलों में प्रजनन की दर कम हुई थी वहीं कोलकाता में यह निगेटिव 1.67 दर्ज की गई। एक ओर महिलाओं में बच्चा पैदा करने की दर घट रही है, दूसरी ओर बच्चों के लिए अस्पतालों से बच्चा चोरी, गरीबी के कारण बच्चा बेचने की खबरें भी छपती रहती हैं। इसके लिए कई वजहें जिम्मेदार मानी जाती हैं। कहीं देर से शादी हो रही है तो कहीं करियर के चक्कर में संतान प्रथामिकता सूची में नीचे पहुंच जाती है। बदलती जीवन शैली भी इसका एक कारण है। इलाज की समुचित और सस्ती सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने और गोद लेने की प्रक्रिया लोगों की पहुंच से दूर होने के कारण कई लोग आजीवन संतान के लिए तरसते रह जाते हैं।
इधर, आंकड़ों से पता चलता है कि पिछले पांच सालों में गोद लेने में 50 फीसद की गिरावट दर्ज की गई है। सेंट्रल एडाप्सन रिसोर्स एजेंसी (सीएआरए) के मुताबिक 2010 में 6321 बच्चों को गोद लिया गया था। जबकि 2013 में यह आंकड़ा घटकर 4354 पर आ गया था। अप्रैल-सितंबर 2014 में यह संख्या सिर्फ 1622 थी। आंकड़े बताते हैं कि पांच साल में देश में 21,736 बच्चे गोद लिए गए, जबकि विदेशी नागरिकों की ओर से गोद लिए जाने वाले बच्चों की संख्या 2156 रही। पश्चिम बंगाल में 2010 में 656 बच्चों को गोद लिया गया था। इसके बाद 2011 में 598, 2012 में 388, 2013 मेंं 399 और सितंबर 2014 में यह संख्या घटकर 86 रह गई।
कई लोगों का मानना है कि बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया सरल हो जाए तो राज्य में 86 बच्चा गोद लेने का आंकड़ा एक-एक  जिले में ही कई गुना बढ़ जाएगा। इतना ही नहीं इससे बच्चा चोरी होने की घटनाओं में भी कमी आ सकती है। इसके साथ ही गरीबी में लोगों को बच्चा बेचने की नौबत नहीं आए, इस बारे में सरकार को सोचना चाहिए। एक व्यक्ति के मुताबिक कई जगह कोशिश करने के बच्चा गोद लेना संभव नहीं हुआ।
एक व्यक्ति ने बताया कि अगर आपके पास पैसे हों तो देश में किसी तरह की समस्या नहीं है। फिल्म स्टार से लेकर दूसरी अमीर हस्तियां जितने मर्जी बच्चे गोद लें, उन्हें कोई परेशानी नहीं होती। उनके लिए तो गर्भ धारण करने से लेकर टेस्ट ट्यूब बेबी जैसे कई तरीके हैं। जबकि आम व्यक्ति प्रतिदिन 100-200 रुपए की कमाई करता है,उसके लिए इस तरह से संतान हासिल करना संभव ही नहीं है।
सूत्रों का कहना है कि केंद्र सरकार की ओर से बच्चा गोद लेने की प्रक्रिया को सरल बनाने के लिए एक ड्राफ्ट गाइडलाइन बनाई गई है। इसके मुताबिक पति-पत्नी भारतीय हों, उनकी उम्र 35 साल से ज्यादा हो, मानसिक,शारीरिक तौर पर स्वस्थ हों, बच्चे की देखभाल के लिए पर्याप्त संसाधन हों, उनके खिलाफ किसी तरह का आपराधिक मामला दर्ज नहीं हो। बताया जाता है कि इसका मकसद बच्चे को पारिवारिक माहौल प्रदान करना है। हालांकि यह मसौदा अंतिम नहीं है, इसमें संसोधन हो सकते हैं।
एक व्यक्ति ने इस बारे में कहा कि राज्य सरकारों को चाहिए कि बच्चा गोद देने वाली एजेंसियों और आवेदन करने वालों पर निगरानी की व्यवस्था की जाए। जिससे सालाना कितने बच्चे वहां आते-जाते हैं, इसका ब्योरा रखने के साथ ही संतानहीन परिवारों की व्यथा भी कम हो सके। फिलहाल तो यह कहा जा सकता है कि गोद लेने वालों के आंकड़ों में तो भारी गिरावट हुई है लेकिन कोई सर्वे कराया जाए तो पता चलेगा कि संतान की चाहत में परेशान दंपत्ति की संख्या में कितनी वृद्धि हुई है।

Thursday, November 27, 2014

चार साहिबजादे

चार साहिबजादों की बहादुरी को देख कर छलके हजारों आंखों में आंसू
रंजीत लुधियानवी
कोलकाता, 16 नवंबर। एक साथ दो हजार से ज्यादा आंखों में आंसू छलकते रहे और यह एक बार नहीं तकरीबन दो घंटे  के दौरान बार-बार हुआ, आंसू बहाने वाली आंखों में पुरुष, महिला, बच्चे, जवान सभी शामिल थे। यह मौका रविवार की सुबह डनलप के सोनाली सिनेमा हाल में देखा गया जहां सुबह नौ बजे वाले शो में 1200 सीटों वाले प्रेक्षागृह में छह महीने से लेकर सात साल के बच्चों को मिलाकर फिल्म देखने वाले दर्शकों की संख्या ज्यादा नहीं तो कम से कम 1500 तो जरुर रही होगी। गुरुद्वारा सिख संगत, डनलप ब्रिज और नौजवान सभा की ओर से निर्माता पम्मी बवेजा, निर्देशक हैरी बवेजा की सिखों के दसवें गुरू गुरू गोविंद सिंह जी के चार साहिबजादों (पुत्रों) पर आधुनिक थ्री डी तकनीक से बनाई गई 129 मिनट की फिल्म ‘चार साहिबजादे’ के मुफ्त प्रदर्शन का था।
पश्चिम बंगाल में पहली बार पंजाबी भाषा की कोई फिल्म इतने व्यापक स्तर पर प्रदर्शित की गई है। आइनाक्स, अवनि पीवीआर, सोनाली, मेनका समेत राज्य के विभिन्न मल्टीप्लेक्स और साधारण सिनेमा घरों में हिंदी, पंजाबी भाषा के थ्री डी और टू डी के लगभग 20 शो प्रतिदिन हो रहे हैं। मालूम हो कि तकरीबन 26 करोड़ की लागत से बनी फिल्म पहले ही देश-विदेश में सुपरहिट हो चुकी है। पहले चार दिनों में 7.90 करोड़ के कारोबार के साथ पहले नौ दिनों में फिल्म 20 करोड़ रुपए का कारोबार कर चुकी है। इतना ही नहीं विदेशों में भी फिल्म ने शानदार कारोबार करते हुए शाहरुख खान की हैप्पी न्यू ईयर को कड़ी टक्कर दी है। तीसरे हफ्ते बंगाल के ब्रांड अंबेसडर की फिल्म ने जहां 178 प्रिंटों पर 2.20 करोड़ रुपए की कमाई की वहीं सिख इतिहास पर अंग्रेजी, हिंदी और पंजाबी तीन भाषाओं में  बनी फिल्म ने पहले हफ्ते उसके मुकाबले 60 प्रिंटों पर 2.27 करोड़ रुपए की कमाई करके रिकार्ड बनाते हुए इंगलैंड, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में पहला स्थान हासिल किया।
‘चार साहिबजादे’ देखकर भाव विभोर हुए दर्शकों का मानना है कि निर्देशक ने बहुत ही साहस और चतुराई के साथ संवेदनशील विषय पर बहुत ही सफलता से फिल्म का निर्माण किया है। मालूम हो कि इससे पहले दारा सिंह की  ‘सवा लाख से एक लड़ाऊं’ (1976) से लेकर मंगल ढिल्लों की  ‘खालसा’ (1999) तक कई फिल्मकारों ने सिख धर्म पर फिल्म बनाने का साहस किया है लेकिन उन्हें भारी मुसीबतों और विरोध का सामना करना पड़ा। खालसा पंथ के  300 साला स्थापना दिवस के मौके पर आनंदपुर साहिब में अपनी फिल्म का प्रदर्शन करने पहुंचे ढिल्लो ने बताया था कि वे तो सिख होने के नाते धर्म का प्रचार करना चाहते हैं लेकिन उन्हें फिल्म प्रदर्शित करने की मंजूरी नहीं दी गई। इस तरह कई लोगों ने प्रयास किए लेकिन विफल हो गए।
फिल्म देखने वालों का कहना है कि हैरी बवेजा ने संवेदनशील विषय पर बेहद चतुराई से फिल्म का निर्माण किया है। खालसा पंथ की स्थापना करने वाले कवि, योद्धा, इतिहासकार , रणनीतिकार से लेकर कुशल श्रृद्धालु गुरू गोविंद सिंह (आपे गुरू-आपे चेला) के चार साहिबजादों के माध्यम से जहां सिखों के साहस, वीरता, चतुराई, नेतृत्व क्षमता  का ओम पुरी की दमदार आवाज में शानदार बखान कियागया है वहीं यह सीख भी दी गई है कि नेता वह होता है जो आगे बढ़कर दुश्मनों का मुकाबला करता है, जरुरत पड़ने पर अपने बेटों को भी शहीद होने के लिए भेजता है। 42 सिखों का 10 लाख मुगल सैनिकों से मुकाबला करने वाली जंग का बखूबी चित्रण करते हुए निर्देशक ने इस बात का भी ख्याल रखा है कि सिख गुरू को नहीं चित्रित किया जा सकता,  इसलिए चित्रों के माध्यम से दसवें गुरू की उपस्थित हर जगह प्रदर्शित की गई है।
कई लोगों के मुताबिक युवा पीढ़ी स्पाइडरमैन, सुपर मैन के काल्पनिक चरित्र देखती है उन्हें ‘चार साहिबजादे’ देखनी चाहिए, जिससे असली नायकों से परिचय हो सके और देश के सभी गैर सिखों के यह फिल्म इसलिए देखनी चाहिए कि सिखों के इतिहास के बारे में महज दो घंटों में जानकारी हासिल कर सकें। मालूम हो कि फिल्म के घटनास्थल से लेकर युद्ध में गुरू की ओर से चलाए गए शस्त्र काल्पनिक नहीं बल्कि असली शस्त्रों की तर्ज पर ही बनाए गए हैं।

Monday, September 15, 2014

मनमोहन सिंह के पक्ष में बोल पड़ी बेटी दमन: मेरे पिता तय करेंगे, आत्मकथा लिखें या नहीं


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Monday, 15 September 2014 16:20
नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुत्री दमन सिंह का कहना है कि





नई दिल्ली। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पुत्री दमन सिंह का कहना है कि उनके पिता आत्मकथा लिखना चाहते हैं या नहीं, इस बारे में फैसला वही करेंगे। 

    दमन ने कल शाम अपनी किताब ‘‘स्ट्रिक्टली पर्सनल : मनमोहन एंड गुरशरण’’ के प्रकाशन से जुड़े एक समारोह में कहा ‘‘इस बारे में मेरे पिता को ही तय करना है। मुझे पूरा विश्वास है कि उनका लिखना इस बात पर निर्भर होगा कि उन्हें यह कितना रोमांचक लगता है।’’
    किताब लिखने के इस कठिन कार्य का आरंभ मनमोहन सिंह और उनकी पत्नी गुरशरण कौर के 1930 के दशक के शुरूआती दिनों की झलक से होता है और यह सफर वर्ष 2004 तक चलता है। मनमोहन और गुरशरण अमृतसर, पटियाला, होशियारपुर, चंडीगढ़, ऑक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, न्यूयॉर्क, जिनीवा, मुंबई तथा नई दिल्ली जैसी जगहों पर रहे और इन जगहों पर उनके प्रवास का जिक्र इस किताब में है।
    इससे पहले दो उपन्यास लिख चुकीं दमन का कहना है कि तीन लेखकों.... विक्रम सेठ, सिल्विया नासर और एम जे अकबर की बायोग्राफीज ने उनमें अपने अभिभावकों के बारे में ‘‘बेहद स्नेह और ईमानदारी’’ से लिखने का जज्बा पैदा हुआ।
    दमन ने कहा ‘‘विक्रम सेठ की ‘टू लाइव्स’ बेहद खूबसूरत रचना है जिसका मुझ पर गहरा असर हुआ। गणितज्ञ जॉन नैश पर लिखी सिल्विया नासर की किताब भी दिलचस्प है। तीसरी किताब नेहरू पर एम जे अकबर द्वारा लिखी बायोग्राफी है। इसका कोई जवाब नहीं है क्योंकि यह एक सार्वजनिक हस्ती के निजी जीवन के पन्ने बेहद करीने से पलटती है।’’
    किताब लेखन का विचार दमन सिंह के मन में करीब पांच

साल पहले से आकार ले रहा था। लेखन प्रक्रिया के बारे में उन्होंने बताया ‘‘मैं सवालों की सूची बनाती, अपने पिता या मां से समय लेती, उनके घर जाती, बातचीत रिकॉर्ड करती और फिर आ कर उसे लिखती।’’
    दमन ने कहा ‘‘यह किताब दो व्यक्तियों के बारे में है। इसमें उनकी सोच, उनकी राय, उनकी आस्थाओं, मूल्यों और आचरण का जिक्र है। इसमें बताया गया है कि कैसे विचार बनते हैं और समय के साथ उनमें कैसे बदलाव आता है।’’
    उन्होंने बताया कि किताब में ‘‘भारत का भी जिक्र है जो विभाजित तो हुआ लेकिन आखिरकार आजाद हो गया। इसमें बताया गया है कि देश ने आगे बढ़ने के लिए साहस के साथ कैसे संघर्ष किया और किस तरह के उतार चढ़ाव भरे दौर से गुजरा।’’
    दमन के अनुसार, अर्थव्यवस्था के बारे में लिखते समय उन्हें चुनौती का सामना करना पड़ा। ‘‘उनसे :मनमोहन सिंह से: आर्थिक मुद्दों पर बात करना मुश्किल था लेकिन उनके जीवन का बड़ा हिस्सा अर्थव्यवस्था को समर्पित रहा इसलिए मैंने न सिर्फ उनसे इस बारे में बात की बल्कि इसे लिखा भी।’’
    उन्होंने कहा ‘‘मैं उन मुद्दों को लेना चाहती थी जिन्हें मैं महत्वपूर्ण समझती थी.... उन्हें आम पाठक के लिए सरल भाषा में लिखना चाहती थी और मुझे उम्मीद है कि मैं ऐसा कर पाई।’’
    यह पूछे जाने पर कि क्या इस किताब पर फिल्म बनाई जाएगी, दमन सिंह ने कहा ‘‘मैं नहीं जानती। अगर फिल्म बनेगी तो मैं नहीं देखना चाहूंगी क्योंकि मैं अपनी किताब को ही पसंद करूंगी।’’
    किताब में पूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिवार की तस्वीरें भी हैं।
(भाषा)

Wednesday, March 19, 2014

रचनाकार समाज को जोड़ने की दिशा में काम करें


 रचनाकारों को चाहिए कि वे समाज में मौजूदा बिखराव को देखते हुए अपनी जिम्मेवारी संभाले और लोगों को जोड़ने का काम करें। यह कहना है कि दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष और प्रोफेसर डाक्टर जगबीर सिंह का। नेशनल बुक ट्रस्ट और पंजाबी साहित्य सभा, कोलकाता की ओर से आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने यह विचार व्यक्त किए। पंजाबी के जाने-माने उपन्यासकार मोहन काहलों के प्रसिद्ध उपन्यास बेड़ी ते बरेता के हिंदी अनुवाद कश्ती और बरेता के लोकार्पण के मौके पर उन्होंने यह विचार व्यक्त किए। नीलम शर्मा अंशु की ओर से अनुवादित उपन्यास का लोकार्पण कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट गेस्ट हाउस में किया गया। इस मौके पर खालसा कालेज माहलपुर के प्रिंसीपल सरदार सुरजीत सिंह रंधावा, वरिष्ठ पत्रकार विश्वंभर नेवर, गीतेश शर्मा, नेशनल बुक ट्रस्ट के हिंदी संपादक डाक्टर ललित मंडोरा, पंजाबी साहित्य सभा के अध्यक्ष सरदार हरदेव सिंह ग्रेवाल समेत हिंदी-पंजाबी के विभिन्न विद्वान उपस्थित थे।
डाक्टर जगबीर सिंह ने कहा कि भले ही हिंदी में उपन्यास परंपरा पश्चिमी की देन है लेकिन उपनिषदों में, कथा सागर में, महाभारत और रामायण में कथा कहने की जो परंपरा कायम रही है उसे भारतीय उपन्यासकारों ने जीवन दर्शन के माध्यम से लोगों के बीच पेश करने का काम किया है। इसमें अनुभव, विद्वता और भाषा का ज्ञान मिलकर पाठकों को उपन्यासकार की रचना के संसार में पहुंच जाता है।
उपन्यास में गुर्जर और मल्लाहों के कबीलाई जीवन दर्शन में साठ साल पहले के लोगों का रहन-सहन पेश किया गया है। जिससे तत्कालीन इतिहास के बारे में भी रोचक जानकारी मिलती है, जिसे लेखक ने नेशनल लाइब्रेरी में घंटों अनुसंधान करके जुटाया है।
उन्होंने कहा कि श्री गुरू ग्रंथ साहिब को भले ही सिखों का धर्म ग्रंथ माना जाता है लेकिन उसमें सिर्फ छह  सिख गुरूओं की रचना दर्ज है, जबकि दूसरे 26 लोगों की रचना का संचलन किया गया है। इसमें कबीर भी हैं और जैदेव भी हैं। समूचे ग्रंथ में लोगों में प्यार, सद्भाव के साथ जीवन यापन का दर्शन पेश किया गया है। ऐसा ही आज के रचनाकारों को भी करना चाहिए।
कोलकाता में पुस्तक के लोकार्पण के बारे में ललित मंडोरा ने कहा कि लेखक सालों से महानगर में रहते हैं और सभी लेखक चाहते हैं कि उनके लोगों के बीच रचना पहुंचे,इसलिए यहां आयोजन किया गया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि इस उपन्यास को बांग्ला समेत दूसरी भाषाओं में भी अनुवादित किया जाएगा।
उपन्यास के बारे में बाद में परिचर्चा का आयोजन किया गया। इस मौके पर पत्रकार गीतेश शर्मा ने कहा कि रचनाकार का काम समाज में घटित को लोगों के सामने पेश करना भर है, यह लेखक का काम नहीं है कि नंगे को कपड़े पहनाकर पेश किया जाए। हिंदी पुस्तकों की दयनीय दशा का वर्णन करते हुए उन्होेंने कहा कि सरकारी खरीद बंद हो जाए तो हिंदी में पुस्तकें छपनी बंद हो जाएं। क्योंकि कोई भी पुस्तक 500 से लेकर एक हजार से ज्यादा नहीं छपती। जब हिंदी का यह हाल है तो पंजाबी और दूसरी भाषाओं का हाल तो जगजाहिर है। हालांकि बांग्ला इसका अपवाद है क्योंकि वहां लोग अभी भी पुस्तकें खरीदते हैं।
कार्यक्रम का संचालन पंजाबी साहित्य सभा के महासचिव सरदार जगमोहन सिंह गिल ने  किया। जबकि परिचर्चा का संचालन नीलम शर्मा अंशु ने किया। पत्रकार रावेल पुष्प, कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट में हिंदी अधिकारी सुमन सेठ के अलावा कई लोगों ने परिचर्चा में हिस्सा लिया और हाशिये के वर्ग पर पंजाबी उपन्यास के हिंदी में अनुवाद का स्वागत किया। 

Tuesday, March 4, 2014

इंटरनेट पर भी लड़ा जाएगा चुनाव

  चुनाव प्रचार करने के लिए जैसे खर्च की सीमा बढ़ गई है वहीं लोगों को लुभाने के लिए नए-नए तरीके अपनाए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस की इकलौती स्टार प्रचारक थी, इसलिए हेलीकाप्टर लेकर जगह-जगह प्रचार किया था। दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाद युवाओं में भड़के आक्रोश और आम आदमी पार्टी की विधानसभा चुनाव में शानदार सफलता के लिए सोशल मीडिया को प्रमुख कारक माना जाता है। इसलिए आगामी लोकसभा चुनाव सड़क और दीवारों के साथ ही इंटरनेट पर भी लड़ा जाएगा। इस मामले में पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी, भाजपा, माकपा, कांग्रेस सभी सक्रिय हैं। हालांकि उनके चाहने वालों की संख्या में फर्क हो सकता है।आंकड़ों की बात करें तो ममता बनर्जी को फेसबुक पर लाइक करने वालों की संख्या छह लाख 25 हजार है तो उनके भतीजे अभिषेक बनर्जी के चाहने वाले डेढ़ लाख, गोरखा जनमुक्ति मोर्चा नेता विमल गुरुंग के लगभग 15 हजार लोग हैं। भाजपा के हजारों चाहने वाले लगातार मोदी को प्रधानमंत्री बनाने के लिए अभियान छेड़े हुए हैं। इसमें नेता, कार्यकर्ता से लेकर दूसरे लोग भी शामिल हैं।  टविटर पर तृणमूल के डेरेक ओ ब्रायन के दो लाख से ज्यादा, शुभेंदु अधिकारी के 12 हजार से ज्यादा,माकपा के सांसद  ऋतव्रत बनर्जी के ग्यारह हजार से ज्यादा, भाजपा के तथागत राय के चार हजार से ज्यादा, तृणमूल के केडी सिंह और दिनेश त्रिवेदी के दो हजार से ज्यादा चाहने वाले हैं।मालूम हो कि हाल तक चुनाव प्रचार के तहत सोशल मीडिया में प्रचार पारंपरिक तरीका नही रहा है लेकिन अब हालात बदल गए हैं। राज्य के नेता और दल अब इस डिजीटल टेक्नोलॉजी पर अधिक ही भरोसा करते दिख रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की ओर से एक डेडिकेटेड वेबसाइट लॉन्च की गयी है। वहीं ट्वीटर और फेसबुक पर उसका प्रचार अभियान जारी है। पार्टी की ओर से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जोर शोर से प्रोजेक्ट किया जा रहा है।  इसके तहत बीते दिनों ‘ममता 4 मीडिया’  वेबसाइट लांच की गई है। इसकी टैगलाइन में दिया गया है कि ममता बनर्जी अब राष्ट्रीय बनी।वेबसाइट के अलावा पार्टी की ओर से यू-टयूूब पर आधिकारिक एकाउंट भी लांच किया गया है। राष्ट्रीय स्तर पर लोगों तक पहुंचने के लिए दल की ओर से यह प्रयास किए  जा रहे हैं। सूत्रों का कहना है कि दल के राष्ट्रीय अभियान के तहत  सोशल मीडिया के जरिए  लोगों की यह जानकारी में लाया जा रहा है कि देश के लिए तृणमूल कांग्रेस ही एकमात्र विकल्प है। अन्ना हजारे की ओर से  समाने लाए गए विकास के 17 सूत्रीय एजेंडे पर तृणमूल कांग्रेस जोर दे रही है।दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस के  राजनीतिक विरोधी भी खामोश नहीं बैठे हैं। तृणमूल के इस प्रचार को आड़े हाथों लेते हुए भी वह पीछे नहीं हैं।  भाजपा नेता तथागत राय भी सोशल मीडिया में मौजूद हैं और राज्य में छपे एक सर्वे पर कुछ दिन पहले टिप्पणी करते हुए उन्होंने कहा कि भले ही यहां भाजपा को एक भी सीट नहीं मिलती दिख रही लेकिन देश भर में मोदी की लहर और भाजपा के गठबंधन की शानदार बढ़त अच्छी है।इधर वरिष्ठ कांग्रेस नेता सोमेन मित्र ने पारंपरिक तौर तरीके से हटते हुए सोशल मीडिया के क्षेत्र में कदम रख दिया है।  हाल ही में वह तृणमूल कांग्रेस  छोड़कर कांग्रेस में शामिल हुए हैं और कोलकाता प्रेस क्लब में अपनी वेब साइट जारी की। उनका मानना है कि युवाओं के संपर्क में आने का यह बहुत अच्छा साधन है। उनकी तरह ही वाममोर्चा नेता भी पीछे नहीं है। माकपा नेता निरुपम सेन, राज्यसभा सांसद ऋतव्रत बनर्जी व रोबिन देव भी फेसबुक पर काफी सक्रिय हैं।हालांकि कुछ लोगों का यह भी कहना है कि सोशल मीडिया प्रचार के लिए प्रभावी साधन नहीं हो सकता। भले ही  इंटरनेट का इस्तेमाल करने वालों की संख्या बढ़ रही है और लोग आनलाइन अभियान से प्रभावित भी होते हैं लेकिन यह केवल शहरी आबादी को अपना लक्ष्य बनाती है। इनमें से कई ऐसे हैं जिनका राजनीति से मोहभंग हो गया है और कई तो वोट करने भी नहीं जाते।  उनका कहना है कि सोशल मीडिया पर तृणमूल कांग्रेस का प्रयास उन्हें अधिक लाभ नहीं प्रदान करने वाला है। हालांकि दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि समाचार पत्रों में विज्ञापन और खबरों के लिए जितने पैसे लगते हैं, यहां मुफ्त में ज्यादा लोगों तक सीधे संपर्क हो जाता है।इस बारे में एक दल के नेता का कहना है कि लोकसभा चुनाव में युवा मतदाताओं की अहम भूमिका होगी। गांव-देहात में भी इंटरनेट का व्यवहार करने वाले समचार पत्र पढ़ने वालों से कम नहीं हैं। इसका पता इसके चलता है कि दिन प्रतिदिन इंटरनेट की कीमतें कंपनियां घटाती जा रही हैं जबकि समाचार पत्रों के दाम बढ़ते जा रहे हैं। महंगाई के दौर में लोग सस्ता और अच्छा तलाशते हैं और सोशल मीडिया इसका सबसे बड़ा साधन है। अमिताभ बच्चन जैसे अभिनेता प्रेस कांफ्रेंस करने के बजाए फेसबुक पर सीधे लाखों लोगों तक पहुंचने को पहल देते हैं। 

रेलवे यात्रियों को देना होगा हलफनामf

 रेलवे में नित्य यात्रा करने वालों को आंदोलन से दूर रखने के लिए रेलवे की ओर से विशेष योजना तैयार की गई है। इसके तहत ट्रेनों के देरी से आने या दूसरी किसी वजह से रेल रोको आंदोलन में शामिल होने और इसके बाद रेलवे की संपति तोड़ने-फोड़ने वालों को अब कम किराए में सफर करने की सुविधा हासिल नहीं होगी। ऐसा करने के बाद पकड़े जाने पर उन्हें मासिक टिकट या पास नहीं दिया जाएगा, पुराना तो जब्त हो जाएगा। रेलवे के नए नियमों के मुताबिक  मासिक या त्रैमासिक टिकट लेकर प्रतिदिन रेलवे में सफर करने वालों को हलफनामा देना होगा कि वे किसी भीतरह की हिंसक गतिविधि में शामिल नहीं होंगे और इसके बाद पकड़े जाने पर उन्हें मासिक टिकट नहीं मिलेगा।मालूम हो कि 13 फरवरी की रात नौ बजे सियालदह स्टेशन जंग के मैदान में तब्दील हो गया था। प्रतिदिन रेलगाड़ियांदेरी से आने के विरोध में यात्रियों का गुस्सा फूट पड़ा। इसके बाद नाराज लोगों ने सियालदह   मेन शाखा में जमकर उत्पात मचाया। ट्रेनों में तोड़फोड़ करके ही उनका गुस्सा शांत नहीं हुआ आरोप है कि रेलवे कर्मचारियों की भी यात्रियों ने पिटाई की थी।इसके अलावा रानाघाट लोकल से पहले लालगोला पैसेंजर को पास करा दिया गया था। सियादलह मेन शाखा में एक घंटे से भी ज्यादा समय तक रेलगाड़ियां रोक डाली। इसके बाद उन्होंने ट्रेन के गार्ड और चालक को भी पीट दिया। ऐसी घटनाएं पूर्व रेलवे के सियालदह शाखा में कोई नई बात नहीं है। लेकिन नई बात यह है कि अगर ऐसी किसी घटना के दौरान रेलवे पुलिस या आरपीएफ  आपको गिरफ्तार करती है तो जिंदगी में कभी भी दोबारा मासिक टिकट नहीं हासिल कर सकेंगे। ऐसे लोगों को प्रतिदिन रेलवे का टिकट कटा कर ही यातायात करना होगा।सूत्रों के मुताबिक रेलवेबोर्ड की ओर से इस तरह का फैसला किया गया है। सियालदह और हावड़ा समेत राज्य के कई स्टेशनों पर इस बारे में सूचना लगा दी गई है। इसमें कहा गया है कि मासिक टिकट लेने वालों को रेलवे की ओर से जारी किए गए एक फार्म के मुताबिक हलफनामा भर कर देना होगा। इसमें यात्रियों को हलफनामा दायर करके बताना होगा कि वे ट्रेन या प्लेटफार्म पर किसी भी तरह के समाजविरोधी काम में शामिल नहीं होगे। लेकिन अगर रेलवे की संपति तोड़फोड़ करते हुए, रेलवे कर्मचारी से मारपीट करने जैसे किसी आपराधिक काम में शामिल पाया गया तो उनका मासिक टिकट तो रद्द होगा ही, वह यात्री सारी जिंदगी ट्रेन में मासिक टिकट पर सफर नहीं कर सकेगा।सूत्रों का कहना है कि कई स्टेशनों पर यह व्यवस्था शुरू भी हो गई है। वहां मासिक टिकट लेने वाले यात्रियों को एक फार्म थमा दिया जाता है। फार्म भरने के बाद रेलवे क्लर्क को जमा देने के बाद ही मासिक टिकट दिया जा रहा है। हालांकि रेलवे की ओर से जारी किए गए आदेश से यात्री परेशान हैं। कुछ लोगों का कहना है कि रेलवे का फैसला सही है वहीं कुछ लोग मानते हैं कि इसका कोई फायदा नहीं होगा।कई नित्ययात्रियों का कहना है कि रेलवे के इस फैसले से ऐसा लगता है कि रेलवे यात्रियों की आवाज बंद करना चाहता है। वह  मर्जी के मुताबिक रेलगाड़ियां चलाए लेकिन कोई इसका विरोध नहीं करे कि ट्रेन देरी से चल रही है या रद्द कर दी गई है। किसीतरह की सुनवाई नहीं होगी। दक्षिण पूर्व रेलवे की लोकल ट्रेनों के यात्री परेशान रहते हैं क्योंकि कोई भी ट्रेन समय पर नहीं आती। सालों से यह चल रहा है क्योंकि विरोध नहीं होता। मौड़ीग्राम के एक यात्री के मुताबिक सुबह 7.44 के बाद लगभग एक घंटे बाद हावड़ा के लिए ट्रेन आती है। इसके बीच एक ट्रेन चलती है लेकिन वह सिर्फ सांतरागाछी तक जाती है। रेलवे लोगों की जुबान बंद करने के फरमान तो जारी करता रहता है, किराया वृद्धि करता रहता है लेकिन यात्री सुविधाओं-समस्याओं की सुध लेने की फिक्र नहीं दिखती है।  

होली से सरकारी कर्मचारियों की छुट््िटयों की सौगात शुरू

 होली से सरकारी कर्मचारियों की छुट््िटयों की सौगात शुरू होने जा रही है। डीए में वृद्धि के बाद जहां पहले से तय छुट््िटयों की सूची तो है ही इसके साथ ही लोकसभा चुनावों के मद्देनजर ढेर सारी छुट््िटयां मिलने जा रही हैं। हालांकि सरकारी दफ्तर को खुले रहेंगे, लेकिन सभी की नजरें चुनाव पर ही रहेंगी।
मालूम हो कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने रविवार होली होने के कारण सोमवार को सरकारी छुट््टी का एलान कर दिया है। इस तरह होली के लिए 15 से लेकर 17 मार्च तक लगातार तीन दिन तक सरकारी कर्मचारियों की छुट््टी रहेगी। इसके बाद अप्रैल में 12 से लेकर 15 और 18 से लेकर 20 अप्रैल तक छुट््टी है। मई में एक और तीन-चार छुट््टी है। सितंबर-अक्तूबर में 30 सितंबर से लेकर आठ अक्तूबर तक छुट््टी के बाद दो दिन के अंतराल बाद ग्यारह और 12 अक्तूबर को छुट््टी है। अक्तूबर महीने में 18-19 के बाद 23 से लेकर 26 अक्तूबर तक छुट््टी रहेगी। नवंबर महीने में एक, दो, चार, छह, आठ और नौ नवंबर छुट््टी है। दिसंबर में 25, 27-28 छुट््टी है।
लोकसभा चुनाव के पहले काम करने के लिए राज्य सरकार ने कैलेंडर जारी किया है। लेकिन छुट््िटयों के कारण काम कैसे पूरा हो पाएगा? चिंता इसे लेकर है। मार्च में जहां होली के कारण लगातार तीन दिन की छुट््टी मिल रही है। वहीं अप्रैल में 16-17 अप्रैल छुट््टी लेने पर एक साथ शनिवार-रविवार समेत छुट््टी के नौ दिन मिल जाएंगे। इसी तरह मई में एक दिन दो मई को छुट््टी ले ली तो चार दिन तक लगातार छुट््टी रहेगी। दुर्गापूजा और कालीपूजा में तो छुट््िटयों की बहार है। इसके बाद साल के अंत में नवंबर -दिसंबर के महीने में तो वैसे भी नए साल के आगमन को लेकर सरकारी कर्मचारी व्यस्त रहते हैं। इसलिए काम कौन करेगा यह सोचना की बात है। सवाल यह  है कि इतनी ज्यादा और लगातार छुट््िटयां होने के कारण क्या सरकार तय समय पर कैलेंडर के मुताबिक काम कर सकेगी या नहीं? 

Monday, February 3, 2014

आम आदमी पार्टी के सदस्यों पर खुफिया एजेंसियों की नजर


रंजीत लुधियानवी
कोलकाता, 2 फरवरी । कोना में आम आदमी पार्टी की ओर से सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है, डनलप में कितने लोग इस दल में शामिल हुए और आगामी चार फरवरी को कालेज स्कवायर से निकलने वाली रैली में कितने लोग शामिल होंगे, इस बारे में खुफिया एजेंसियों की खास नजर है।
सूत्रों से पता चला है कि केंद्र सरकार की इंटेलिजेंस ब्यूरो की राज्य शाखा (आईबी) की ओर से सवालों की एक सूची तैयार की गई है।इसके मुताबिक पश्चिम बंगाल में अब तक कितने लोग आम आदमी पार्टी के सदस्य बन गए हैं? कितने लोग अभी तक दूरी कायम रख कर दल को नैतिक समर्थन दे रहे हैं? इनमें से कोई खास आदमी तो नहीं है, अगर है तो उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि क्या रही है? राज्य में किस-किस जिले में कार्यालय बनाए गए हैं? जिला शाखाओं की जिम्मेवारी किसके पास है? ऐसे लोगों का संपूर्ण बायोडाटा कि उनका परिचय क्या है, समाज में क्या स्थिति है, क्या कामकाज करते हैं, शामिल है।
इसके साथ ही सवालों की लड़ी में यह भी शामिल है कि लोकसभा में कितनी सीटों पर आप चुनाव लड़ सकता है? इतना ही नहीं किस दल के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की तैयारी की जा रही है। किस राजनीतिक दल का समर्थन लेकर चुनाव लड़ने की कोशिश चल रही है। क्या राज्य की सभी 42 सीटों पर मुकाबला करेंगे और लोकसभा में किसे टिकट दिया जा सकता है।
सवालों की सूची मेंं यह भी शामिल है कि अकेले चुनाव लड़ने पर उन्हें कितनी सीटें मिल सकती है? सीटें अगर नहीं मिलती हैं तो वोट काटने पर तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, माकपा, भाजपा को किसे कितना नुकसान पहुंच सकता है। यह वोट कितने फीसद तक घट सकते हैं। उम्मीदवारों की सूची में कितने खास लोग शामिल हो सकते हैं और उन पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी? इतना ही नहीं राज्य में किस संस्था,राजनीतिक और गैर राजनीतिक दल की ओर से उन्हें समर्थन किया जा रहा है? उन्हें रकम कहां से मिल रही है। बताया जाता है कि फरवरी में ही यह रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेज दी जाएगी।
सूत्रोें का कहना है कि सवालों के जवाब तलाशने के लिए खुफिया विभाग ने गुप्त तरीके से राज्य के आम आदमी पार्टी के सदस्यों की गतिविधियों पर नजर रखने के साथ ही कई विभिन्न स्तर के नेताओं से बातचीत भी की है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि अभी सारे तथ्य इकट्ठा नहीं किए जा सके हैं। इसका कारण यह है कि लोकसभा के उम्मीदवारों की सूची तैयार होने में अभी कुछ समय लग सकता है। माना जा रहा है कि फरवरी के मध्य तक उम्मीदवारोे ं की सूची तैयार हो जाएगी। इसके बाद केंद्र को रिपोर्ट भेजी जाएगी।
सूत्रों का कहना है कि कई खास लोगों के आप से संबंध के बारे में आईबी को जानकारी मिली है। इसके तहत राज्य का एक बुद्धीजीवी शामिल है। बताया जाता है कि 30 जनवरी को वे ब्रिगेड की तृणमूल कांग्रेस की रैली में मंच पर सुशोभित थे। उन्होंने दल से कहा है कि वे नैतिक समर्थन देते रहेंगे। जबकि एक प्रसिद्ध गायिका और विवादों में घिरे रहने वाले आईपीएस अधिकारी भी शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबिक आम आदमी पार्टी के बारे में हासिल की जाने वाली जानकारी कोई नई बात नहीं है। सदैव से यह प्रचलन रहा है कि किसी भी नई संस्था, संगठन या दल के गठन के बाद खुफिया विभाग को उसका ब्यौरा इकट्ठा करना पड़ता है। भले ही वह राजनीतिक संगठन हो या गैर राजनीतिक संगठन, इससे कोई सरोकार नहीं है। इसलिए राज्य में नए दल के गठन को लेकर लोकसभा चुनाव से पहले ब्यौरा इकट्ठा करना रुटीन बात है।
हालांकि दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि आगामी लोकसभा चुनाव जिस हालत में हो रहे हैं, उसमें स्पष्ट है कि किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में क्षेत्रीय दलों के साथ ही आप की भी अहम भूमिका हो सकती है। एक व्यक्ति के मुताबिक इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव में 60 फीसद से ज्यादा युवा समाज के   मतदाता शामिल हैं। तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल करके आप ने उन्हें अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की है। नई दिल्ली विधानसभा के परिणाम इसकी ताजा मिसाल हैं। इसका ही नतीजा है कि कई सर्वे में मोदी के बाद अरविंद केजरीवाल राहुल गांधी को पछाड़ कर प्रधानमंत्री की दौड़ में दूसरे स्थान पर चल रहे हैं।
कई राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि चुनाव में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा होगा। आप की ओर से प्रकाशित बेईमानों की सूची में जहां कांग्रेस के बड़े नाम शामिल हैं वहीं भाजपा भी इससे अछुती नहीं है। समाजवादी पार्टी से लेकर बहुजन समाज पार्टी के लोग इसमें शामिल हैं। देश में 350 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान करने के बाद सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ मोर्चा खोलने से माना जा रहा है कि कांग्रेस का वोट बैंक तो प्रभावित होगा ही दूसरे दल भी इसके प्रभाव से नहीं बच सकेंगे।
ऐसे हालात में आप की कालेज स्कवायरकी रैली निकलने वाली है। राज्य प्रशासन के एक अधिकारी के मुताबिक आप के गठन के बाद एक बार रुटीन पड़ताल की गई थी, अब लोकसभा के पहले दल की पूरी जन्मपत्री तैयार की जा रही है। 

Thursday, January 16, 2014

कोचिंग कारोबार तले अंधेरा

  भारत में ट्यूशन उद्योग के अध्ययन पर आधारित एशिया डेवलपमेंट बैंक की इस रिपोर्ट के अनुसार आज शहरों में अपने बच्चों की ट्यूशन पर अभिभावक प्रतिमाह औसत 2349 रुपए और गांवों में 1456 रुपए खर्च करते हैं। तथ्य यह है कि इंजीनियरिंग, डाक्टरी, मैनेजमेंट या अन्य किसी भी पेशेवर कालेज में प्रवेश के लिए आजकल ट्यूशन लेना लगभग जरूरी हो चला है। पेशेवर कालेज ही क्यों, प्रशासनिक सेवा, फौज या सरकारी स्कूल में मास्टर की नौकरी पाने के लिए भी कोचिंग इंस्टिट्यूट की शरण लेना अब एक अनिवार्य शर्त बन चुकी है। एसोसिएटेड चेम्बर आफ कामर्स इंडस्ट्री आफ इण्डिया (एसोचेम) द्वारा दस बड़े नगरों में कराए अध्ययन की रिपोर्ट से इस बात को और साफ समझा जा सकता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरू, जयपुर, हैदराबाद, अहमदाबाद, लखनऊ और चंडीगढ़ में किये सर्वे से चौंकाने वाला सच सामने आया। इन नगरों में प्राइमरी कक्षा के 87 फीसदी और सेकेंडरी स्तर के 95 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं।
उक्त तथ्यों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अच्छी स्कूली शिक्षा, पेशेवर पाठ्यक्रमों और बेहतर नौकरियों की होड़ से गरीब और निम्न मध्य वर्ग को सुनियोजित तरीके से बाहर किया जा रहा है। पैसे की ताकत ने आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी जमात के बच्चों के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला लेना या अच्छी नौकरी पाना असंभव बना दिया है। आज शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को अच्छा इनसान बनाना नहीं, नौकरी के बाजार के काबिल बनाना है। अच्छी नौकरी पाने के लिए अच्छे संस्थान में प्रवेश पाना पहली शर्त है और प्रवेश के लिए अच्छे कोचिंग इंस्टिट्यूट या महंगी ट्यूशन पढऩा अनिवार्य है। ट्यूशन के लिए मोटा पैसा चाहिए और जिसकी हैसियत ट्यूशन फीस चुकाने की नहीं है, वह खुद-ब- खुद अच्छी नौकरी की होड़ से बाहर हो जाता है।
ट्यूशन में फोकस ज्ञानवर्धन नहीं होता बल्कि वहां परीक्षा पास करने के गुर सिखाए जाते हैं और इसकी मोटी कीमत वसूली जाती है। भारत में ट्यूशन फीस एक से चार हजार रुपये महीने के बीच है जबकि व्यक्तिगत ट्यूटर हजार से पांच हजार रुपए घंटे के बीच लेते हैं। मां-बाप की जैसी हैसियत होती है, वे अपने बच्चों को वैसी ही ट्यूशन लगवाते हैं। एक अध्ययन के अनुसार आज मध्य आय वर्ग के लोग अपनी आमदनी का एक-तिहाई पैसा बच्चों की ट्यूशन पर खर्च कर रहे हैं। उनका एक ही सपना होता है कि बच्चा कैसे भी डाक्टर, इंजीनियर, एमबीए बन जाए।
कहने को ट्यूशन या कोचिंग को संगठित क्षेत्र में नहीं गिना जाता लेकिन जानकारों का मानना है कि आज यह धंधा दुनिया के सबसे तेजी से फल-फूल रहे प्रथम 16 कारोबारों में शुमार है। आज दुनिया में कोचिंग का कारोबार लगभग 63 खरब रुपये का है और इसकी विकास दर सात फीसदी है। भारत ट्यूशन बाजार का सरगना है। फिलहाल हमारे देश में इस धंधे से सालाना लगभग 14 अरब रुपये की कमाई हो रही है जो 2015 में बढ़कर 23.86 अरब हो जाने की सम्भावना है। अब अनेक बड़े औद्योगिक घराने भी कोचिंग के काम में उतर आए हैं।
स्कूलों में अच्छे शिक्षकों का अभाव, शिक्षकों द्वारा कक्षा में पढ़ाने के बजाय ट्यूशन पर ध्यान देने, कक्षा में छात्रों की बढ़ती संख्या, अभिभावकों के पास समय की कमी, पेशेवर संस्थानों में प्रवेश की गारंटी तथा बच्चों की मानसिक असुरक्षा भी कुछ अन्य कारण हैं। तीन दशक पहले इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेजों में प्रवेश पाने वाले अधिकांश छात्र सरकारी स्कूलों के होते थे। अब स्थिति उलट गई है। सरकार का ध्यान सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता पर बिल्कुल नहीं है। सर्वशिक्षा अभियान में भी गुणवत्ता की उपेक्षा की गई है। निजी स्कूल तो मुनाफे की अवधारणा पर ही टिके हैं। ऐसे में ट्यूशन के धंधे को फलने-फूलने से कौन रोक सकता है ?
पिछले पांच साल में बड़ी संख्या में निजी कालेज और विश्वविद्यालय खुले, फिर भी शिक्षा का स्तर उठ नहीं पाया। छात्रों को अच्छी नौकरी पाने या अच्छे संस्थानों में प्रवेश के लिए ट्यूशन की बैसाखी का सहारा लेना ही पड़ता है। जिन संस्थानों को हम सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, दुनिया के नक्शे पर उनकी कोई पहचान नहीं है। आज विश्व के श्रेष्ठ दो सौ विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में से एक भी भारतीय नहीं है। जिन आईआईटी और आईआईएम पर हम इतराते हैं, वे भी इस सूची में स्थान बनाने में विफल रहे हैं। दूसरी ओर ब्रिक्स देशों में चीन के सात तथा ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका के एक-एक विश्वविद्यालय इस सूची में आते हैं। एक अध्ययन के अनुसार देश के 75 फीसदी टेक्निकल ग्रेजुएट और 90 प्रतिशत जनरल ग्रेजुएट नौकरी पाने लायक नहीं हैं। सा$फ है जब हमारे यहां उच्च शिक्षा का स्तर ऐसा है तब दुनिया के श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों में शुमार होने की कल्पना कैसे की जा सकती है?
उच्च शिक्षा और पेशेवर संस्थानों में ग्रामीण इलाकों और पिछड़े वर्ग की दुर्दशा को यूं भी समझा जा सकता है। सन् 2008 में उच्च शिक्षा संस्थानों में ग्रामीण इलाकों के छात्रों की संख्या 45 फीसदी थी जबकि देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी। जनजातियों, अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों का प्रतिशत क्रमश: चार, 13.5 और 35 था जो उनकी जनसंख्या से नीचे था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कितनी असमानता है और ट्यूशन के धंधे से यह असमानता घटने की बजाय और बढ़ रही है।  

Monday, December 2, 2013

सबसे काबिल हैं पंजाबी, पश्चिम बंगाल फिसड्डी


 देश में रोजगार की दृष्टि से सबसे अधिक योग्य (यानी काबिल) लोग पंजाबी हैं जबकि सबसे कम योग्य (फिसड्डी) पश्चिम बंगाल के हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा जारी इंडिया स्किल रिपोर्ट 2014 से यह तथ्य सामने आया है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय तथा सी.आई. आई. एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित तीसरे राष्ट्रीय कौशल विकास सम्मेलन में यह रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार देश में रोजगार की दृष्टि से योग्य लोगों में 42.47 प्रतिशत लोग पंजाब से आते हैं जबकि तमिलनाडु से 36.13 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश से 30.44 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश से 33.4 प्रतिशत, दिल्ली से 29.68 प्रतिशत, कर्नाटक से 17.63 प्रतिशत, ओडिशा से 12.43 प्रतिशत एवं पश्चिम बंगाल से 4.23 प्रतिशत लोग रोजगार की दृष्टि से योग्य हैं।

रिपोर्ट के अनुसार उद्योग जगत में कार्यरत महिलाओं तथा पुरुषों के अनुपात में काफी अंतर है लेकिन रोजगार की दृष्टि से योग्य महिलाएं सर्वाधिक पंजाब से हैं जबकि सबसे कम योग्य महिलाएं पश्चिम बंगाल में हैं। रिपोर्ट के अनुसार रोजगार की दृष्टि से सर्वाधिक योग्य पुरुष तमिलनाडु में हैं जबकि सबसे कम योग्य पुरुष पश्चिम बंगाल में हैं।

Thursday, November 21, 2013

छोटे परदे की बदलती दुनिया



-विश्व टेलीविजन दिवस-

आज विश्व टेलीविजन दिवस है. यह दिन है न सिर्फ टेलीविजन की विकासयात्रा को याद करने का, बल्कि यह समझने का भी कि टेलीविजन ने दुनिया को बदलने में किस तरह अपनी भूमिका निभायी है. टेलीविजन के अब तक के सफर, समाज में उसकी भूमिका और उसमें आ रहे बदलावों को समेटने की कोशिश करता आज का नॉलेज

आज की पीढ़ी को शायद यह विश्वास नहीं होगा कि महज दोत्नतीन दशक पहले लोग टेलीविजन पर कार्यक्रम देखने के लिए आसत्नपड़ोस के घरों में जाया करते थे. जिस तरह आज शहरों और सुविधासंपन्न गांवों में तकरीबन हर घर में टेलीविजन मौजूद है, ऐसा उस समय नहीं हुआ करता था. अस्सी के दशक में देश में जब टेलीविजन ने उच्चवर्गीय घरों के दायरे से निकलते हुए मध्यवर्गीय परिवारों में प्रवेश किया, तो किसी को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि इतनी जल्दी यह इतना लोकप्रिय हो जायेगा. 1990 के महज एक दशक की अवधि में यह तकरीबन प्रत्येक मध्यवर्गीय घरों में लोकप्रिय हो गया.

भारत में भले ही टेलीविजन की शुरुआत 1959 में हो चुकी थी, लेकिन इसकी लोकप्रियता 1980 के दशक में कायम हुई. रामानंद सागर निर्देशित धारावाहिक ‘रामायण’ , 1982 के एशियाई खेलों और 1987 में भारत में आयोजित ‘विश्व कप क्रिकेट’ ने भारत में टेलीविजन की लोकप्रियता को बहुत हद तक बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभायी. धारावाहिक ‘रामायण’ के प्रसारण के समय तो सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था.

इसे टेलीविजन की लोकप्रियता ही कहा जायेगा कि इस धारावाहिक में ‘भगवान राम’ का किरदार निभानेवाले अरुण गोविल को लोग उनके नाम से कम, बल्कि ‘भगवान राम’ की भूमिका के लिए अधिक जानने लगे.  तकरीबन उसी दौर में ‘बुनियाद’ और ‘हम लोग’ जैसे धारावाहिकों, जिन्हें भारत का शुरुआती शोप ऑपेरा भी कहा जा सकता है, ने भारत में टेलीविजन की दुनिया को एकदम से बदल दिया. क्रिकेट खेल के सीधे प्रसारण ने लोगों में एक अलग तरह का रोमांच पैदा कर दिया. हालांकि उस दौर में रंगीन टेलीविजन की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट की तुलना में ज्यादा कीमती होने के चलते इसकी मौजूदगी बहुत कम ही घरों में थी. लेकिन दो दशकों से कम समय में भारत में  टेलीविजन ने संचार के दूसरे साधनों के समान ही अविश्वसनीय प्रगति की है. इस प्रगति की कहानी में दूरदर्शन की कहानी अभिन्न तरीके से जुड़ी हुई है.

दूरदर्शन की उपलब्धि

दूरदर्शन ने देश में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और वैज्ञानिक सोच को एक नयी दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. इसने देश में लंबे समय तक पब्लिक ब्रॉडकास्टर की भूमिका निभायी और अपनी तमाम खामियों के बावजूद यह काम आज भी कर रहा है. दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को प्रयोगात्मक आधार पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया था. उस समय दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में महज तीन दिन आधात्नआधा घंटे ही होता था. उस समय इसे ‘टेलीविजन इंडिया’ के नाम से जाना जाता था. वर्ष 1975 में इसका हिंदी नामकरण ‘दूरदर्शन’ नाम से किया गया.

दूरदर्शन ने धीरे-धीरे अपने पैर पसारे और दिल्ली में 1965, मुंबई में 1972, कोलकाता और  चेन्नई में 1975 में इसका प्रसारण शुरू किया गया. 15 अगस्त, 1965 को पहले समाचार बुलेटिन का प्रसारण दूरदर्शन से किया गया था. दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर रात साढ़े आठ बजे प्रसारित होने वाला राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन तकरीबन उसी समय से आज भी जारी है. 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के प्रसारण से श्वेत और श्याम दिखने वाला दूरदर्शन रंगीन हो गया.

टेलीविजन की कहानी

कई लोगों की कड़ी मेहनत और तकरीबन तीन दशक के रिसर्च के बाद टेलीविजन का आविष्कार हुआ. सबसे पहले 1875 में बोस्टन के जॉर्ज कैरे ने सुझाव दिया था कि किसी चित्र के सारे अवयवों या घटकों को एक साथ इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भेजा जा सकता है. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए 1887 में एडवियर्ड मायब्रिज ने इनसान और जानवरों के हलचल की फोटोग्राफिक रिकॉर्डिग की. इसे उन्होंने लोकोमोशन नाम दिया. इसके बाद ऑगस्टे और लुईस लुमियर नाम के दो भाईयों ने सिनेमैटोग्राफ नाम की संरचना का विचार रखा, जिसमें एक साथ कैमरा, प्रोजेक्टर और प्रिंटर था. उन दोनों ने 1895 में पहली पब्लिक फिल्म बनायी. 1907 में रूसी वैज्ञानिक बोरिस रोसिंग ने पहले एक प्रयोगात्मक टेलीविजन प्रणाली के रिसीवर में एक सीआरटी का उपयोग किया और इससे टीवी को नया रूप मिला. फिर लंदन में स्कॉटिश आविष्कारक जॉन लोगी बेयर्ड चलती छवियों के संचरण का प्रदर्शन करने में सफल रहे. बेयर्ड स्कैनिंग डिस्क ने एक रंग छवियों का 30 लाइनों को संकल्प कर उसे प्रस्तुत किया. इस तरह टीवी के आविष्कार में अनेक वैज्ञानिकों ने अहम रोल अदा किया, लेकिन ब्लादीमीर ज्योरकिन को ही ‘टीवी का पिता’ कहा जाता है. उन्होंने 1923 में आइकोनोस्कोप की खोज की. यह ऐसी ट्यूब थी, जो एक चित्र को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किसी चित्र से जोड़ती है. इसके कुछ साल बाद ही उन्होंने काइनस्कोप यानी कैथोडत्नरे ट्यूब खोज निकाली. इसकी मदद से उन्होंने एक स्क्वायर इंच का पहला टीवी बनाया. यह ब्लैक एंड व्हाइट टीवी थी. इसके बाद रंगीन टेलीविजन की तकनीक को खोजने में तकरीबन बीस वर्ष लग गये. दुनिया की पहली रंगीन टेलीविजन 1953 में बनी.

टेलीविजन प्रसारण में बीबीसी ने पहला टीवी प्रसारण केंद्र बनाते हुए 1932 में अपनी सेवा शुरू की. 22 अगस्त, 1932 को लंदन के ब्रॉडकास्ट हाउस से पहली बार टीवी का प्रायोगिक प्रसारण शुरू हुआ और 2 नवंबर, 1932 को बीबीसी ने एलेक्जेंडरा राजमहल से दुनिया का पहला नियमित टीवी चैनल का प्रसारण शुरू कर दिया था. इसके पांच साल बाद राजा जॉर्ज छठवें ने राज्याभिषेक समारोह को ब्रिटेन की जनता तक सीधे पहुंचाने के लिए पहली बार ओवी वैन का इस्तेमाल किया. उसके बाद 12 जून 1937 को पहली बार विंबल्डन टेनिस का सीधा प्रसारण दिखाया गया था. 9 नवंबर 1947 को टेलीविजन के इतिहास में पहली बार टेली रिकार्डिग कर उसी कार्यक्रम का रात में प्रसारण किया गया. वहीं दूसरी तरफ अमेरिका में 1946 में एबीसी टेलीविजन नेटवर्क का उदय हुआ. पहली बार रंगीन टेलीविजन का अविर्भाव 17 दिसंबर 1953 को अमेरिका में हुआ और विश्व का पहला रंगीन विज्ञापन कैप्सूल 6 अगस्त 1953 को न्यूयॉर्क में प्रसारित हुआ था. 1967 में पूरी दुनिया की करोड़ों जनता ने अमेरिका की नेटवर्क टीवी के जरिये चांद पर गये दोनों आतंरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतरते देखा. इसके बाद 1976 में पहली बार केबल नेटवर्क के जरिये टेलीविजन प्रसारण का इतिहास कायम किया गया. 1979 में सिर्फ खेलकूद का विशेष टीवी नेटवर्क इएसपीएन स्थापित हुआ.

पिछले दो दशकों में टेलीविजन की दुनिया ने आश्चर्यजनक प्रगति की है. इस प्रगति में न सिर्फ नयेत्ननये टेलीविजन सेटों का आविष्कार शामिल है, बल्कि टेलीविजन देखने का पूरा तरीका ही बदल गया है. अब टेलीविजन मोबाइल फोन और इंटरनेट पर भी उपलब्ध है. आज टेलीविजन हाइ डिफिनिशन हो चुका है, थ्री डाइमेंशनल हो गया है. वास्तव में अपनी शुरुआत के 80 वर्षो में टेलीविजन की प्रगति आश्चर्यचकित करती है, लेकिन आनेवाले समय में इसे कंप्यूटर से और कड़ी चुनौती मिलना तय है. बहरहाल दुनिया में संचार के तरीके को बदलने में इसने जो भूमिका निभायी है, वह अविस्मरणीय है.

टेलीविजन संचार का सबसे सशक्त माध्यम है. लोगों को दुनियाभर की जानकारी देने में टेलीविजन की अहम भूमिका को देखते हुए 17 दिसंबर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 नवंबर को हर वर्ष विश्व टेलीविजन दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया. 21 नवंबर की तारीख इसलिए चुनी गयी, क्योंकि इसी दिन पहले विश्व टेलीविजन फोरम की बैठक हुई थी. माना जाता है कि विश्व टेलीविजन दिवस मनाने का कारण यह भी रहा कि टेलीविजन के द्वारा एकत्नदूसरे देशों की शांति, सुरक्षा, आर्थिक सामाजिक विकास व संस्कृति को जाना व समझा जा सके.

 इनकी निगाह में टेलीविजन

बान की-मून, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव

टेलीविजन ने पूरे विश्व में लोगों के रहन-सहन के तौर-तरीकों और उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है. समानता आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से, टेलीविजन ने वैश्विक मुद्दों को रेखांकित किया है और समुदायों एवं परिवारों के बीच संघर्षो और उम्मीदों को समझने में मददगार साबित हुआ है. संयुक्त राष्ट्र यह कामना करता है कि प्रसारकों के सहयोग से यह समाज को सूचना और शिक्षा मुहैया कराने के साथ-साथ हमारे लिए एक बेहतर दुनिया के निर्माण की ओर अग्रसर होगा.

 लेक वालेसा, पोलैंड के पूर्व राष्ट्रपति (1990-95),

नोबेल विजेता

लोकतंत्र की एक ऐसी आधारशिला, जिससे असीमित सूचना तक पहुंच कायम होती है. टेलीविजन चैनलों का बहुलवाद (प्लूरलिज्म) इनमें से इसका एक आवश्यक और अनिवार्य तत्व है.

 कोफी अन्नान, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव (1997-2006)

टेलीविजन लोगों की भलाई के लिए एक जबरदस्त ताकत हो सकता है. इससे जुड़े हुए लोगों को यह दुनियाभर में बड़ी संख्या में शिक्षा मुहैया करा सकता है. यह इसे प्रदर्शित कर सकता है कि हम अपने पड़ोस, नजदीक और दूर स्थित लोगों के साथ किस तरह से जुड़े हुए हैं. और, यह उस कोने में पसरे अंधेरे में रोशनी फैला सकता है, जहां अज्ञान और नफरत ने अपने पैर फैला रखे हैं. ऐसे कंटेंट तैयार करते हुए, जो न केवल ताकतवर, बल्कि कमजोर लोगों की कहानी को भी बयां करते होंत्न आपसी समझ और धैर्य को बढ़ावा देने के रूप में टेलीविजन उद्योग की अहम भूमिका है. इसका फायदा न केवल दुनिया के धनी देशों को  हुआ है, बल्कि उन सभी विकासशील देशों को भी इससे बहुत फायदा हुआ है, जिसमें दुनिया की ज्यादातर आबादी रहती है.

दूरदर्शन की यात्रा

आकाशवाणी के भाग के रूप में टेलीविजन सेवा की नियमित शुरुआत दिल्ली से वर्ष 1965 से हुई थी.  दूरदर्शन की स्थापना 15 सितंबर, 1976 को हुई. उसके बाद रंगीन प्रसारण की शुरुआत नयी दिल्ली में 1982 के एशियाई खेलों के दौरान हुई. इसके बाद तो देश में प्रसारण क्षेत्र में बड़ी क्रांति आ गयी. दूरदर्शन का तेजी से विकास हुआ और 1984 में देश में तकरीबन हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया गया. इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण मोड़ को इस तरह से रेखांकित किया जा सकता है.

- दूसरे चैनल की शुरुआत : दिल्ली (9 अगस्त, 1984), मुंबई (1 मई, 1985), चेन्नई (19 नवंबर, 1987), कोलकाता (1 जुलाई, 1988)

- मेट्रो चैनल शुरू करने के लिए एक दूसरे चैनल की नेटवर्किग  : 26 जनवरी, 1993

-अंतरराष्ट्रीय चैनल डीडी इंडिया की शुरुआत : 14 मार्च, 1995

त्नप्रसार भारती का गठन (भारतीय प्रसारण निगम) : 23 नवंबर, 1997

-खेल चैनल डीडी स्पोर्ट्स की शुरुआत : 18 मार्च, 1999

-संवर्धन/ सांस्कृतिक चैनल की शुरुआत : 26 जनवरी, 2002

-24 घंटे के समाचार चैनल डीडी न्यूज की शुरुआत : 3 नवंबर, 2002



-निशुल्क डीटीएच सेवा डीडी डाइरेक्ट प्लस की शुरुआत : 16 दिसंबर, 2004

Friday, September 13, 2013

आधार के आंकड़े निराशाजनक, समयसीमा बढ़ाने की होगी सिफारिश



रंजीत लुधियानवी

कोलकाता, 12 सितंबर। आगामी 2014 की फरवरी तक सभी लोगों का आधार कार्ड बनाने की समयसीमा राज्य सरकार ने तय कर दी है। इस दौरान राज्य के सभी जिलों को तीन भागों में बांट कर आधार कार्ड बनाने का काम पूरा करने का फैसला किया गया है। इसके साथ ही जिन लोगों के कार्ड के लिए तस्वीरें खींचने का काम हो चुका है और अभी तक कार्ड नहीं मिला है। ऐसे लोगों के लिए ई-आधार कार्ड चालू करने का निर्णय किया गया है। अभी तक आधार कार्ड के दायरे में नहीं आने वालों को कार्ड बनाने के लिए पंचायत इलाके के नागरिकों को बीडीओ कार्यालय, नगर निगम इलाके में रहने वालों के लिए निगम कार्यालय और नगरपालिका इलाके में रहने वलों के लिए संबंधित बोरो या वार्ड कार्यालय में जाकर फार्म में खुद से संबंधित 15 आवश्यक आंकड़े दर्ज करवाने होंगे। ऐसा करने के लिए अपने पास पहचान पत्र (आइडेंटी प्रूफ) और रहने का रिहायशी प्रमाण पत्र (एड्रेस प्रूफ) लेकर जाना होगा। इसके बाद यह पता लगाने का प्रयास करेंकि आपके इलाके में आधार कार्ड के लिए कब फोटो खींचने वाले  शिविर का आयोजन किया जा रहा है। तय तिथि पर फोटो और बायोमैट्रिक आंकड़ें जमा करवा दें। हालांकि लौटने से पहले एकनालेजमेंट रसीद जरूर प्राप्त कर लें। तीन महीने तक डाक के माध्यम से कार्ड आपके घर पहुंच जाना चाहिए। ऐसे नहीं होने पर डब्लूडब्लूडब्लू डाट यूआईडीएआआई डाट आइएन वेबसाइट के ई आधार पोर्टल पर प्राप्त की गई रसीद के नंबर से स्टेटस की जांच कर सकते हैं।
मालूम हो कि आगामी एक नवंबर से कोलकाता, हावड़ा और कूचबिहार जिलों में रसोई गैस पर सबसिडी सीधे ग्राहक के बैंक खाते में जमा हो जाएगी। इसके लिए ग्राहक के पास आधार कार्ड या आधार नंबर होना चाहिए। बगैर कार्ड या नंबर वाले उपभोक्ताओं को 31 जनवरी तक सबसिडी वाला सिलेंडर मिलता रहेगा। इसके बाद जब तक आधार कार्ड या नंबर प्राप्त नहीं होता है, बगैर सबसिडी वाला सिलेंडर खरीदना होगा।
अगर आप खुशकिस्मत हैं और आधार के दायरे में आ चुके हैं, तब रसोई गैस डिस्ट्रीब्यूटर से मुफ्त में दो फार्म हासिल करें, एक फार्म में आधार कार्ड नंबर समेत दूसरे आंकड़े भर कर डिस्ट्रीब्यूटर के पास जमा करें। इसके साथ आधार कार्ड की प्रतिलिपि (जेराक्स) जमा देना न भूलें। बैंक के लिए दूसरा फार्म भरकर जिस बैंक में आप सबसिडी लेना चाहते हैं, बैंक खाता और आधार नंबर लिखकर जमा कर दें। डिस्ट्रीब्यूटर के कार्यालय में बैंक का फार्म एक बाक्स  में डाल दें या सीधे जाकर बैंक में जमा कर सकते हैं। इसके बाद आपका आधार नंबर रसोई गैस के कंजुमर नंबर से साथ जुड़ जाएगा। इसी तरह आपका आधार नंबर बैंक खाते के साथ लिंक हो जाएगा।
परियोजना के चालू होने के बाद पहला गैस सिलेंडर बुक करते ही संबंधित बैंक खाते में 490 रुपए जमा हो जाएंगे। जब आपके घर सिलेंडर आएगा, तब आपको बाजार दर पर सिलेंडर के लिए कीमत देनी होगी। इस महीने सिलेंडर की कीमत कोलकाता में 967 रुपए हैं।   सबसिडी वाले सिलेंडर के लिए आपको 412 रुपए 50 पैसे देने चाहिए, जबकि भुगतान ज्यादा का कर रहे हैं, इसलिए 64 रुपए 50 पैसे सिलेंडर मिलने के बाद आपके खाते में जमा हो जाएंगे। इसके बाद दूसरे सिलेंडर के दौरान बुकिंग करते ही सबसिडी की सारी रकम आपके खाते में जमा हो जाएगी। एक वित्त वर्ष में आपके एक अप्रैल से लेकर 31 मार्च की अवधि तक सबसिडी वाले नौ सिलेंडर मिलेंगे, इसके बाद खरीदे जाने वाले सिलेंडर पर आपको सबसिडी नहीं मिलेगी।
आंकड़ों के मुताबिक 11 मार्च 2013 तक कोलकाता में 55.46, हावड़ा में 60.50 फीसद और हुगली में 46.57 लोगों को आधार कार्ड मिले हैं, जबकि यहां 31 अक्तूबर तक काम पूरा होने की समयसीमा है। उत्तर चौबीस परगना में 7.29 फीसद और दक्षिण चौबीस परगना में 21.58 फीसद लोगों के कार्ड बने हैं, यहां 28 फरवरी तक कार्ड बनाने की समय सीमा तय की गई है। हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आधार कार्ड के दायरे में आने वाले जिलों में पहला नंबर हावड़ा जिले का है। यहां सबसे ज्यादा 83.9 फीसद लोग इस दायरे में आ चुके हैं। जबकि उत्तर दिनाजपुर में 8.3 फीसद, बांकुड़ा में 13.9 फीसद, कूचबिहार में 77 फीसद, जलपाईगुड़ी में 23.3 फीसद, दार्जिलिंग में 25 फीसद, दक्षिण दिनाजपुर में 50.6 फीसद, मालदा में 42.4 फीसद, हुगली में 79 फीसद, कोलकाता में 63.37 फीसद, मुर्शिदाबाद में 56 फीसद , पूर्व मेदिनीपुर जिले में 47.2 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले में 36.1 फीसद , बर्दवान जिले में 3.8, नदिया जिले में 34.5 फीसद,  वीरभूम 30.6 फीसद, उत्तर चौबीस परगना जिले में 27.9 फीसद, पश्चिम मेदिनीपुर जिले में 24.6 फीसद लोग आधार के दायरे में आ चुके हैं।
 राज्य के जनगणना विभाग के संयुक्त अधिकारी पीके मजुमदार का कहना है कि आधार बनाने के मामले में राज्य आठवें स्थान पर है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि हम कार्ड बनाने के मामले में पिछड़े हुए हैं। पंचायत चुनाव और डाक घर में पिन कोड की समस्या को लेकर जरूर कार्ड बनाने में देरी हुई है, ऐसा नहीं होता तो हालात और अच्छे होते। पंचायत चुनाव के लिए मार्च के अंत में अधिसूचना जारी हुई थी और जुलाई तक प्रक्रिया पूरी हुई। इस दौरान ग्रामीण इलाकों में कार्ड बनाने का काम पूरी तरह से बंद रहा। इसके बाद एक नाम के कई जगह पिनकोड अपलोड होने के कारण शहरी इलाकों में आधार का काम थम गया था।
राज्य सरकार की ओर से कोलकाता, हावड़ा, हुगली, बांकुड़ा,कूचबिहार, दक्षिण दिनाजपुर और मालदा जिले के लिए 31 अक्तूबर तक आधार कार्ड बनाने का काम पूरा करने की समयसीमा तय कर दी है। जबकि वीरभूम, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिमी मेदिनीपुर, पुरुलिया, उत्तर दिनाजपुर और जलपाईगुड़ी जिले में 31 दिसंबर तक समयसीमा तय की गई है। बर्दवान,उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया और दार्जिलिंग जिले के लिए 28 फरवरी की समयसीमा तय की गई है।
इधर राज्य सरकार के सूत्रों का कहना है कि सिलेंडर की सबसिडी सीधे उपभोक्ताओं के खाते में पहुंचाने के लिए सभी लोगों को 28 फरवरी तक आधार के दायरे में लाने की परियोजना बनाई गई है। गृह सचिव बासुदेव बंदोपाध्याय के मुताबिक इस बारे में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को पत्र लिख कर कहा जाएगा कि तय समय पर काम पूरा नहीं हुआ तब सबसिडी के मामले में समयसीमा बढ़ाई जाए, जिससे लोगों को किसी तरह की परेशानी नहीं हो।