Monday, December 2, 2013

सबसे काबिल हैं पंजाबी, पश्चिम बंगाल फिसड्डी


 देश में रोजगार की दृष्टि से सबसे अधिक योग्य (यानी काबिल) लोग पंजाबी हैं जबकि सबसे कम योग्य (फिसड्डी) पश्चिम बंगाल के हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा जारी इंडिया स्किल रिपोर्ट 2014 से यह तथ्य सामने आया है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय तथा सी.आई. आई. एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित तीसरे राष्ट्रीय कौशल विकास सम्मेलन में यह रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार देश में रोजगार की दृष्टि से योग्य लोगों में 42.47 प्रतिशत लोग पंजाब से आते हैं जबकि तमिलनाडु से 36.13 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश से 30.44 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश से 33.4 प्रतिशत, दिल्ली से 29.68 प्रतिशत, कर्नाटक से 17.63 प्रतिशत, ओडिशा से 12.43 प्रतिशत एवं पश्चिम बंगाल से 4.23 प्रतिशत लोग रोजगार की दृष्टि से योग्य हैं।

रिपोर्ट के अनुसार उद्योग जगत में कार्यरत महिलाओं तथा पुरुषों के अनुपात में काफी अंतर है लेकिन रोजगार की दृष्टि से योग्य महिलाएं सर्वाधिक पंजाब से हैं जबकि सबसे कम योग्य महिलाएं पश्चिम बंगाल में हैं। रिपोर्ट के अनुसार रोजगार की दृष्टि से सर्वाधिक योग्य पुरुष तमिलनाडु में हैं जबकि सबसे कम योग्य पुरुष पश्चिम बंगाल में हैं।

Thursday, November 21, 2013

छोटे परदे की बदलती दुनिया



-विश्व टेलीविजन दिवस-

आज विश्व टेलीविजन दिवस है. यह दिन है न सिर्फ टेलीविजन की विकासयात्रा को याद करने का, बल्कि यह समझने का भी कि टेलीविजन ने दुनिया को बदलने में किस तरह अपनी भूमिका निभायी है. टेलीविजन के अब तक के सफर, समाज में उसकी भूमिका और उसमें आ रहे बदलावों को समेटने की कोशिश करता आज का नॉलेज

आज की पीढ़ी को शायद यह विश्वास नहीं होगा कि महज दोत्नतीन दशक पहले लोग टेलीविजन पर कार्यक्रम देखने के लिए आसत्नपड़ोस के घरों में जाया करते थे. जिस तरह आज शहरों और सुविधासंपन्न गांवों में तकरीबन हर घर में टेलीविजन मौजूद है, ऐसा उस समय नहीं हुआ करता था. अस्सी के दशक में देश में जब टेलीविजन ने उच्चवर्गीय घरों के दायरे से निकलते हुए मध्यवर्गीय परिवारों में प्रवेश किया, तो किसी को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि इतनी जल्दी यह इतना लोकप्रिय हो जायेगा. 1990 के महज एक दशक की अवधि में यह तकरीबन प्रत्येक मध्यवर्गीय घरों में लोकप्रिय हो गया.

भारत में भले ही टेलीविजन की शुरुआत 1959 में हो चुकी थी, लेकिन इसकी लोकप्रियता 1980 के दशक में कायम हुई. रामानंद सागर निर्देशित धारावाहिक ‘रामायण’ , 1982 के एशियाई खेलों और 1987 में भारत में आयोजित ‘विश्व कप क्रिकेट’ ने भारत में टेलीविजन की लोकप्रियता को बहुत हद तक बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभायी. धारावाहिक ‘रामायण’ के प्रसारण के समय तो सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था.

इसे टेलीविजन की लोकप्रियता ही कहा जायेगा कि इस धारावाहिक में ‘भगवान राम’ का किरदार निभानेवाले अरुण गोविल को लोग उनके नाम से कम, बल्कि ‘भगवान राम’ की भूमिका के लिए अधिक जानने लगे.  तकरीबन उसी दौर में ‘बुनियाद’ और ‘हम लोग’ जैसे धारावाहिकों, जिन्हें भारत का शुरुआती शोप ऑपेरा भी कहा जा सकता है, ने भारत में टेलीविजन की दुनिया को एकदम से बदल दिया. क्रिकेट खेल के सीधे प्रसारण ने लोगों में एक अलग तरह का रोमांच पैदा कर दिया. हालांकि उस दौर में रंगीन टेलीविजन की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट की तुलना में ज्यादा कीमती होने के चलते इसकी मौजूदगी बहुत कम ही घरों में थी. लेकिन दो दशकों से कम समय में भारत में  टेलीविजन ने संचार के दूसरे साधनों के समान ही अविश्वसनीय प्रगति की है. इस प्रगति की कहानी में दूरदर्शन की कहानी अभिन्न तरीके से जुड़ी हुई है.

दूरदर्शन की उपलब्धि

दूरदर्शन ने देश में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और वैज्ञानिक सोच को एक नयी दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. इसने देश में लंबे समय तक पब्लिक ब्रॉडकास्टर की भूमिका निभायी और अपनी तमाम खामियों के बावजूद यह काम आज भी कर रहा है. दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को प्रयोगात्मक आधार पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया था. उस समय दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में महज तीन दिन आधात्नआधा घंटे ही होता था. उस समय इसे ‘टेलीविजन इंडिया’ के नाम से जाना जाता था. वर्ष 1975 में इसका हिंदी नामकरण ‘दूरदर्शन’ नाम से किया गया.

दूरदर्शन ने धीरे-धीरे अपने पैर पसारे और दिल्ली में 1965, मुंबई में 1972, कोलकाता और  चेन्नई में 1975 में इसका प्रसारण शुरू किया गया. 15 अगस्त, 1965 को पहले समाचार बुलेटिन का प्रसारण दूरदर्शन से किया गया था. दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर रात साढ़े आठ बजे प्रसारित होने वाला राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन तकरीबन उसी समय से आज भी जारी है. 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के प्रसारण से श्वेत और श्याम दिखने वाला दूरदर्शन रंगीन हो गया.

टेलीविजन की कहानी

कई लोगों की कड़ी मेहनत और तकरीबन तीन दशक के रिसर्च के बाद टेलीविजन का आविष्कार हुआ. सबसे पहले 1875 में बोस्टन के जॉर्ज कैरे ने सुझाव दिया था कि किसी चित्र के सारे अवयवों या घटकों को एक साथ इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भेजा जा सकता है. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए 1887 में एडवियर्ड मायब्रिज ने इनसान और जानवरों के हलचल की फोटोग्राफिक रिकॉर्डिग की. इसे उन्होंने लोकोमोशन नाम दिया. इसके बाद ऑगस्टे और लुईस लुमियर नाम के दो भाईयों ने सिनेमैटोग्राफ नाम की संरचना का विचार रखा, जिसमें एक साथ कैमरा, प्रोजेक्टर और प्रिंटर था. उन दोनों ने 1895 में पहली पब्लिक फिल्म बनायी. 1907 में रूसी वैज्ञानिक बोरिस रोसिंग ने पहले एक प्रयोगात्मक टेलीविजन प्रणाली के रिसीवर में एक सीआरटी का उपयोग किया और इससे टीवी को नया रूप मिला. फिर लंदन में स्कॉटिश आविष्कारक जॉन लोगी बेयर्ड चलती छवियों के संचरण का प्रदर्शन करने में सफल रहे. बेयर्ड स्कैनिंग डिस्क ने एक रंग छवियों का 30 लाइनों को संकल्प कर उसे प्रस्तुत किया. इस तरह टीवी के आविष्कार में अनेक वैज्ञानिकों ने अहम रोल अदा किया, लेकिन ब्लादीमीर ज्योरकिन को ही ‘टीवी का पिता’ कहा जाता है. उन्होंने 1923 में आइकोनोस्कोप की खोज की. यह ऐसी ट्यूब थी, जो एक चित्र को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किसी चित्र से जोड़ती है. इसके कुछ साल बाद ही उन्होंने काइनस्कोप यानी कैथोडत्नरे ट्यूब खोज निकाली. इसकी मदद से उन्होंने एक स्क्वायर इंच का पहला टीवी बनाया. यह ब्लैक एंड व्हाइट टीवी थी. इसके बाद रंगीन टेलीविजन की तकनीक को खोजने में तकरीबन बीस वर्ष लग गये. दुनिया की पहली रंगीन टेलीविजन 1953 में बनी.

टेलीविजन प्रसारण में बीबीसी ने पहला टीवी प्रसारण केंद्र बनाते हुए 1932 में अपनी सेवा शुरू की. 22 अगस्त, 1932 को लंदन के ब्रॉडकास्ट हाउस से पहली बार टीवी का प्रायोगिक प्रसारण शुरू हुआ और 2 नवंबर, 1932 को बीबीसी ने एलेक्जेंडरा राजमहल से दुनिया का पहला नियमित टीवी चैनल का प्रसारण शुरू कर दिया था. इसके पांच साल बाद राजा जॉर्ज छठवें ने राज्याभिषेक समारोह को ब्रिटेन की जनता तक सीधे पहुंचाने के लिए पहली बार ओवी वैन का इस्तेमाल किया. उसके बाद 12 जून 1937 को पहली बार विंबल्डन टेनिस का सीधा प्रसारण दिखाया गया था. 9 नवंबर 1947 को टेलीविजन के इतिहास में पहली बार टेली रिकार्डिग कर उसी कार्यक्रम का रात में प्रसारण किया गया. वहीं दूसरी तरफ अमेरिका में 1946 में एबीसी टेलीविजन नेटवर्क का उदय हुआ. पहली बार रंगीन टेलीविजन का अविर्भाव 17 दिसंबर 1953 को अमेरिका में हुआ और विश्व का पहला रंगीन विज्ञापन कैप्सूल 6 अगस्त 1953 को न्यूयॉर्क में प्रसारित हुआ था. 1967 में पूरी दुनिया की करोड़ों जनता ने अमेरिका की नेटवर्क टीवी के जरिये चांद पर गये दोनों आतंरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतरते देखा. इसके बाद 1976 में पहली बार केबल नेटवर्क के जरिये टेलीविजन प्रसारण का इतिहास कायम किया गया. 1979 में सिर्फ खेलकूद का विशेष टीवी नेटवर्क इएसपीएन स्थापित हुआ.

पिछले दो दशकों में टेलीविजन की दुनिया ने आश्चर्यजनक प्रगति की है. इस प्रगति में न सिर्फ नयेत्ननये टेलीविजन सेटों का आविष्कार शामिल है, बल्कि टेलीविजन देखने का पूरा तरीका ही बदल गया है. अब टेलीविजन मोबाइल फोन और इंटरनेट पर भी उपलब्ध है. आज टेलीविजन हाइ डिफिनिशन हो चुका है, थ्री डाइमेंशनल हो गया है. वास्तव में अपनी शुरुआत के 80 वर्षो में टेलीविजन की प्रगति आश्चर्यचकित करती है, लेकिन आनेवाले समय में इसे कंप्यूटर से और कड़ी चुनौती मिलना तय है. बहरहाल दुनिया में संचार के तरीके को बदलने में इसने जो भूमिका निभायी है, वह अविस्मरणीय है.

टेलीविजन संचार का सबसे सशक्त माध्यम है. लोगों को दुनियाभर की जानकारी देने में टेलीविजन की अहम भूमिका को देखते हुए 17 दिसंबर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 नवंबर को हर वर्ष विश्व टेलीविजन दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया. 21 नवंबर की तारीख इसलिए चुनी गयी, क्योंकि इसी दिन पहले विश्व टेलीविजन फोरम की बैठक हुई थी. माना जाता है कि विश्व टेलीविजन दिवस मनाने का कारण यह भी रहा कि टेलीविजन के द्वारा एकत्नदूसरे देशों की शांति, सुरक्षा, आर्थिक सामाजिक विकास व संस्कृति को जाना व समझा जा सके.

 इनकी निगाह में टेलीविजन

बान की-मून, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव

टेलीविजन ने पूरे विश्व में लोगों के रहन-सहन के तौर-तरीकों और उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है. समानता आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से, टेलीविजन ने वैश्विक मुद्दों को रेखांकित किया है और समुदायों एवं परिवारों के बीच संघर्षो और उम्मीदों को समझने में मददगार साबित हुआ है. संयुक्त राष्ट्र यह कामना करता है कि प्रसारकों के सहयोग से यह समाज को सूचना और शिक्षा मुहैया कराने के साथ-साथ हमारे लिए एक बेहतर दुनिया के निर्माण की ओर अग्रसर होगा.

 लेक वालेसा, पोलैंड के पूर्व राष्ट्रपति (1990-95),

नोबेल विजेता

लोकतंत्र की एक ऐसी आधारशिला, जिससे असीमित सूचना तक पहुंच कायम होती है. टेलीविजन चैनलों का बहुलवाद (प्लूरलिज्म) इनमें से इसका एक आवश्यक और अनिवार्य तत्व है.

 कोफी अन्नान, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव (1997-2006)

टेलीविजन लोगों की भलाई के लिए एक जबरदस्त ताकत हो सकता है. इससे जुड़े हुए लोगों को यह दुनियाभर में बड़ी संख्या में शिक्षा मुहैया करा सकता है. यह इसे प्रदर्शित कर सकता है कि हम अपने पड़ोस, नजदीक और दूर स्थित लोगों के साथ किस तरह से जुड़े हुए हैं. और, यह उस कोने में पसरे अंधेरे में रोशनी फैला सकता है, जहां अज्ञान और नफरत ने अपने पैर फैला रखे हैं. ऐसे कंटेंट तैयार करते हुए, जो न केवल ताकतवर, बल्कि कमजोर लोगों की कहानी को भी बयां करते होंत्न आपसी समझ और धैर्य को बढ़ावा देने के रूप में टेलीविजन उद्योग की अहम भूमिका है. इसका फायदा न केवल दुनिया के धनी देशों को  हुआ है, बल्कि उन सभी विकासशील देशों को भी इससे बहुत फायदा हुआ है, जिसमें दुनिया की ज्यादातर आबादी रहती है.

दूरदर्शन की यात्रा

आकाशवाणी के भाग के रूप में टेलीविजन सेवा की नियमित शुरुआत दिल्ली से वर्ष 1965 से हुई थी.  दूरदर्शन की स्थापना 15 सितंबर, 1976 को हुई. उसके बाद रंगीन प्रसारण की शुरुआत नयी दिल्ली में 1982 के एशियाई खेलों के दौरान हुई. इसके बाद तो देश में प्रसारण क्षेत्र में बड़ी क्रांति आ गयी. दूरदर्शन का तेजी से विकास हुआ और 1984 में देश में तकरीबन हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया गया. इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण मोड़ को इस तरह से रेखांकित किया जा सकता है.

- दूसरे चैनल की शुरुआत : दिल्ली (9 अगस्त, 1984), मुंबई (1 मई, 1985), चेन्नई (19 नवंबर, 1987), कोलकाता (1 जुलाई, 1988)

- मेट्रो चैनल शुरू करने के लिए एक दूसरे चैनल की नेटवर्किग  : 26 जनवरी, 1993

-अंतरराष्ट्रीय चैनल डीडी इंडिया की शुरुआत : 14 मार्च, 1995

त्नप्रसार भारती का गठन (भारतीय प्रसारण निगम) : 23 नवंबर, 1997

-खेल चैनल डीडी स्पोर्ट्स की शुरुआत : 18 मार्च, 1999

-संवर्धन/ सांस्कृतिक चैनल की शुरुआत : 26 जनवरी, 2002

-24 घंटे के समाचार चैनल डीडी न्यूज की शुरुआत : 3 नवंबर, 2002



-निशुल्क डीटीएच सेवा डीडी डाइरेक्ट प्लस की शुरुआत : 16 दिसंबर, 2004

Friday, September 13, 2013

आधार के आंकड़े निराशाजनक, समयसीमा बढ़ाने की होगी सिफारिश



रंजीत लुधियानवी

कोलकाता, 12 सितंबर। आगामी 2014 की फरवरी तक सभी लोगों का आधार कार्ड बनाने की समयसीमा राज्य सरकार ने तय कर दी है। इस दौरान राज्य के सभी जिलों को तीन भागों में बांट कर आधार कार्ड बनाने का काम पूरा करने का फैसला किया गया है। इसके साथ ही जिन लोगों के कार्ड के लिए तस्वीरें खींचने का काम हो चुका है और अभी तक कार्ड नहीं मिला है। ऐसे लोगों के लिए ई-आधार कार्ड चालू करने का निर्णय किया गया है। अभी तक आधार कार्ड के दायरे में नहीं आने वालों को कार्ड बनाने के लिए पंचायत इलाके के नागरिकों को बीडीओ कार्यालय, नगर निगम इलाके में रहने वालों के लिए निगम कार्यालय और नगरपालिका इलाके में रहने वलों के लिए संबंधित बोरो या वार्ड कार्यालय में जाकर फार्म में खुद से संबंधित 15 आवश्यक आंकड़े दर्ज करवाने होंगे। ऐसा करने के लिए अपने पास पहचान पत्र (आइडेंटी प्रूफ) और रहने का रिहायशी प्रमाण पत्र (एड्रेस प्रूफ) लेकर जाना होगा। इसके बाद यह पता लगाने का प्रयास करेंकि आपके इलाके में आधार कार्ड के लिए कब फोटो खींचने वाले  शिविर का आयोजन किया जा रहा है। तय तिथि पर फोटो और बायोमैट्रिक आंकड़ें जमा करवा दें। हालांकि लौटने से पहले एकनालेजमेंट रसीद जरूर प्राप्त कर लें। तीन महीने तक डाक के माध्यम से कार्ड आपके घर पहुंच जाना चाहिए। ऐसे नहीं होने पर डब्लूडब्लूडब्लू डाट यूआईडीएआआई डाट आइएन वेबसाइट के ई आधार पोर्टल पर प्राप्त की गई रसीद के नंबर से स्टेटस की जांच कर सकते हैं।
मालूम हो कि आगामी एक नवंबर से कोलकाता, हावड़ा और कूचबिहार जिलों में रसोई गैस पर सबसिडी सीधे ग्राहक के बैंक खाते में जमा हो जाएगी। इसके लिए ग्राहक के पास आधार कार्ड या आधार नंबर होना चाहिए। बगैर कार्ड या नंबर वाले उपभोक्ताओं को 31 जनवरी तक सबसिडी वाला सिलेंडर मिलता रहेगा। इसके बाद जब तक आधार कार्ड या नंबर प्राप्त नहीं होता है, बगैर सबसिडी वाला सिलेंडर खरीदना होगा।
अगर आप खुशकिस्मत हैं और आधार के दायरे में आ चुके हैं, तब रसोई गैस डिस्ट्रीब्यूटर से मुफ्त में दो फार्म हासिल करें, एक फार्म में आधार कार्ड नंबर समेत दूसरे आंकड़े भर कर डिस्ट्रीब्यूटर के पास जमा करें। इसके साथ आधार कार्ड की प्रतिलिपि (जेराक्स) जमा देना न भूलें। बैंक के लिए दूसरा फार्म भरकर जिस बैंक में आप सबसिडी लेना चाहते हैं, बैंक खाता और आधार नंबर लिखकर जमा कर दें। डिस्ट्रीब्यूटर के कार्यालय में बैंक का फार्म एक बाक्स  में डाल दें या सीधे जाकर बैंक में जमा कर सकते हैं। इसके बाद आपका आधार नंबर रसोई गैस के कंजुमर नंबर से साथ जुड़ जाएगा। इसी तरह आपका आधार नंबर बैंक खाते के साथ लिंक हो जाएगा।
परियोजना के चालू होने के बाद पहला गैस सिलेंडर बुक करते ही संबंधित बैंक खाते में 490 रुपए जमा हो जाएंगे। जब आपके घर सिलेंडर आएगा, तब आपको बाजार दर पर सिलेंडर के लिए कीमत देनी होगी। इस महीने सिलेंडर की कीमत कोलकाता में 967 रुपए हैं।   सबसिडी वाले सिलेंडर के लिए आपको 412 रुपए 50 पैसे देने चाहिए, जबकि भुगतान ज्यादा का कर रहे हैं, इसलिए 64 रुपए 50 पैसे सिलेंडर मिलने के बाद आपके खाते में जमा हो जाएंगे। इसके बाद दूसरे सिलेंडर के दौरान बुकिंग करते ही सबसिडी की सारी रकम आपके खाते में जमा हो जाएगी। एक वित्त वर्ष में आपके एक अप्रैल से लेकर 31 मार्च की अवधि तक सबसिडी वाले नौ सिलेंडर मिलेंगे, इसके बाद खरीदे जाने वाले सिलेंडर पर आपको सबसिडी नहीं मिलेगी।
आंकड़ों के मुताबिक 11 मार्च 2013 तक कोलकाता में 55.46, हावड़ा में 60.50 फीसद और हुगली में 46.57 लोगों को आधार कार्ड मिले हैं, जबकि यहां 31 अक्तूबर तक काम पूरा होने की समयसीमा है। उत्तर चौबीस परगना में 7.29 फीसद और दक्षिण चौबीस परगना में 21.58 फीसद लोगों के कार्ड बने हैं, यहां 28 फरवरी तक कार्ड बनाने की समय सीमा तय की गई है। हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आधार कार्ड के दायरे में आने वाले जिलों में पहला नंबर हावड़ा जिले का है। यहां सबसे ज्यादा 83.9 फीसद लोग इस दायरे में आ चुके हैं। जबकि उत्तर दिनाजपुर में 8.3 फीसद, बांकुड़ा में 13.9 फीसद, कूचबिहार में 77 फीसद, जलपाईगुड़ी में 23.3 फीसद, दार्जिलिंग में 25 फीसद, दक्षिण दिनाजपुर में 50.6 फीसद, मालदा में 42.4 फीसद, हुगली में 79 फीसद, कोलकाता में 63.37 फीसद, मुर्शिदाबाद में 56 फीसद , पूर्व मेदिनीपुर जिले में 47.2 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले में 36.1 फीसद , बर्दवान जिले में 3.8, नदिया जिले में 34.5 फीसद,  वीरभूम 30.6 फीसद, उत्तर चौबीस परगना जिले में 27.9 फीसद, पश्चिम मेदिनीपुर जिले में 24.6 फीसद लोग आधार के दायरे में आ चुके हैं।
 राज्य के जनगणना विभाग के संयुक्त अधिकारी पीके मजुमदार का कहना है कि आधार बनाने के मामले में राज्य आठवें स्थान पर है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि हम कार्ड बनाने के मामले में पिछड़े हुए हैं। पंचायत चुनाव और डाक घर में पिन कोड की समस्या को लेकर जरूर कार्ड बनाने में देरी हुई है, ऐसा नहीं होता तो हालात और अच्छे होते। पंचायत चुनाव के लिए मार्च के अंत में अधिसूचना जारी हुई थी और जुलाई तक प्रक्रिया पूरी हुई। इस दौरान ग्रामीण इलाकों में कार्ड बनाने का काम पूरी तरह से बंद रहा। इसके बाद एक नाम के कई जगह पिनकोड अपलोड होने के कारण शहरी इलाकों में आधार का काम थम गया था।
राज्य सरकार की ओर से कोलकाता, हावड़ा, हुगली, बांकुड़ा,कूचबिहार, दक्षिण दिनाजपुर और मालदा जिले के लिए 31 अक्तूबर तक आधार कार्ड बनाने का काम पूरा करने की समयसीमा तय कर दी है। जबकि वीरभूम, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिमी मेदिनीपुर, पुरुलिया, उत्तर दिनाजपुर और जलपाईगुड़ी जिले में 31 दिसंबर तक समयसीमा तय की गई है। बर्दवान,उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया और दार्जिलिंग जिले के लिए 28 फरवरी की समयसीमा तय की गई है।
इधर राज्य सरकार के सूत्रों का कहना है कि सिलेंडर की सबसिडी सीधे उपभोक्ताओं के खाते में पहुंचाने के लिए सभी लोगों को 28 फरवरी तक आधार के दायरे में लाने की परियोजना बनाई गई है। गृह सचिव बासुदेव बंदोपाध्याय के मुताबिक इस बारे में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को पत्र लिख कर कहा जाएगा कि तय समय पर काम पूरा नहीं हुआ तब सबसिडी के मामले में समयसीमा बढ़ाई जाए, जिससे लोगों को किसी तरह की परेशानी नहीं हो। 

Wednesday, June 12, 2013

बंगाल में अपराध घटे या बढ़े?

 राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाओं में वृद्धि हुई है। नेशनल क्राईम रिकार्ड  ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। लेकिन राज्य सरकार का कहना है कि बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ संगीन अपराध की घटनाओं में कमी हुई है। रिपोर्ट में सरकारी पक्ष का जिक्र नहीं किया गया है।
 राज्य के पुलिस महानिदेशक नपराजित मुखर्जी ने बुधवार को एक पत्रकार सम्मेलन में कहा कि राज्य में बलात्कार की घटनाएं अऔर संगीन अपराध में मामलों में उल्लेखनीय कमी हुई है। लेकिन ब्यूरो ने हमारा पक्ष छापने से इंकार कर दिया। हमलोगों ने ब्यूरो को लिखा कि हमारा पक्ष प्रकाशित किया जाए, जिससे आंकड़ों के बारे में गलत धारणाएं नहीं हो। 
मालूम हो कि क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 2012 में अपराध के 30942 घटनाएं हुई हैं, जबकि 2011 में यह 29133 थी। डकैती की घटनाएं 236 के बजाए 279 दर्ज हुई।  हत्या के मामले 2109 से बढ़कर 2252, हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि बलात्कार की घटनाएं इस दौरान 2363 से घटकर 2046 हो गई है। जबकि मुखर्जी ने दावा किया कि यहां के  हालात दूसरे राज्यों के बेहतर हैं। उनका कहना है कि हमलोग महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को रोकने के लिए बहुत गंभीर हैं और बीते छह महीने में इस बारे में कई कदम उठाए गए हैं। 
मालदा, उत्तर दिनाजपुर और हल्दिया में बलात्कार और गंभीर अपराध की घटनाओं के मामले में उम्र कैद की सजा दिए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इससे अपराध दर और उत्पीड़न की रोकथाम के बारे में बीते छह महीने के दौरान हमारी कोशिशों का पता चलता है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि संगीन अपराध के मामले बीते साल के मुकाबले 2317 से घट कर 2012 में 1978 हो गए हैं। 
मालूम हो कि पुलिस महानिदेशक का बयान उत्तर चौबीस परगना जिले के बारासात में कालेज छात्रा से सामूहिक बलात्कार की घटना के पांच दिन बाद आया है, जब सारे राज्य में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बारासात में नया पुलिस थाना बनाने के बारे में विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही सामूहिक बलात्कार के मामले में पहले की कठोर कदम उठाए गए हैं। हालांकि उन्होंने माना कि उत्तर चौबीस परगना जिले के बैरकपुर में तीन पत्रकारों पर हमला करने के मामले में मुख्य अभियुक्त शिबु यादव फरार है। 
मुख्य सचिव संजय मित्र ने बारासात सामूहिक बलात्कार और टीवी पत्रकारों पर हमले की घटनाओं को बीते दो-तीन दिनों में हुई  छिटपुट घटनाएं बताते हुए कहा कि पुलिस  एक्शन ले रही है। हमलोग चार्जशीट पेश करके अदालत से सख्त सजा दिए जाने की मांग करेंगे। उन्होंने कहा कि अपराध के मामले में राज्य सरकार किसी भी तरह की राहत बरतने के लिए तैयार नहीं है। 
  


Thursday, June 6, 2013

ममता अग्निपरीक्षा तो सफल हुई पर संकट टला नहीं


रंजीत लुधियानवी
कोलकाता, 6   जून । भाजपा और कांग्रेस के बगैर  हावड़ा लोकसभा उपचुनाव सीट पर चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  एक अग्निपरीक्षा में सफल हो गई हैं । दल के वोट भी नहीं घटे हैं। लेकिन इसके बावजूद सत्ताधारी दल के लोगों के चेहरे पर सफलता मिलने पर  खुशी की झलक नहीं दिख रही है। जबकि तृणमूल कांग्रेस अकेले दम पर सफल ही नहीं रही है, अपने मतदाताओं को भी साथ रखने में कामयाब हुई है। इस दौरान बाहरी उम्मीदवार, अंदरुनी गुटबाजी, शारदा चिट फंड घोटाले  और कांग्रेस की ओर से तृणमूल कांग्रेस को पराजित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने का भी विरोधियों को फायदा नहीं मिला । इसका सबसे बड़ा कारण माकपा के वोट प्रतिशत में वृद्धि है। बीते दो साल में पहली बार वाममोर्चा किसी उपचुनाव में अपने वोट बढ़ाने में सफल रही है। चार फीसद से ज्यादा वोट बढ़ने के साथ ही दो विधानसभा केंद्रों पर भी लीड हासिल करने में सफल रही, जिससे तृणमूल समर्थक हैरान-परेशान हैं।
तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि सप्तरथी षडयंत्र के खिलाफ अभिमन्यु की तरह ममता बनर्जी ने माकपा,कांग्रेस, भाजपा, तीन बांग्ला टीवी चैनलों, तीन बांग्ला दैनिक समाचार पत्रों और एक श्रेणी के बुद्धिजीवियों से संघर्ष किया, जिन्होंने सरकार से जो हासिल करने की उम्मीद की थी, वह सफल नहीं हुई। इसके बाद वे लोग विरोधी बन गए। इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस के वोट घटे नहीं बल्कि बढ़ गए हैं। आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस को 2006 के विधानसभा में 12.25 फीसद मत मिले थे। जबकि 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस गठबंधन को 49.94 फीसद वोट मिले थे। इसमें कांग्रेस के वोट निकाल दिए जाएं तो तृणमूल के वोट 37.69 फीसद होते हैं जबकि 2013 के लोकसभा उपचुनाव में तृणमूल ने लगभग सात फीसद ज्यादा 44.68 फीसद मत प्राप्त किए हैं। इतना ही नहीं 2009 के लोकसभा की बात करें तब भी कांग्रेस-तृणमूल गठजोड़ को 48.04 और माकपा को 44.27 फीसद वोट मिले थे। इसमें कांग्रेस के वोट निकालने पर भी तृणमूल के वोट ज्यादा ही दिखते हैं। जबकि माकपा के वोट 44.27 फीसद से घट कर 41.85 फीसद रह गए हैं।
विधानसभा नतीजों में भी ज्यादा हेरफेर नहीं हुआ है। पिछले लोकसभा की तरह ही इस बार भी विधानसभा इलाकों का नतीजा 5-2 रहा है। हालांकि तब  माकपा ने तब बाली और उत्तर हावड़ा में बढ़त हासिल की थी जबकि इस बार दक्षिण हावड़ा और सांकराईल में बढ़त मिली है। इस तरह विधानसभा इलाकों की स्थित, वोट प्रतिशत बढ़ने के साथ ही तृणमूल ने प्रतिष्ठा की सीट पर जीत हासिल की है। लेकिन समस्या यह है कि वोट प्रतिशत बढ़ने के साथ ही जीत का फर्क बहुत ज्यादा घट गया है। इसमें एक बड़ा कारण कांग्रेस के वोट माने जा रहे हैं भले ही वह कहीं भी सफल नहीं हो सकी। इसके अलावा भाजपा के वोट वाले इलाके उत्तर हावड़ा, मध्य हावड़ा, पांचला में वोट बढ़े हैं। विधानसभा (2011) में माकपा सभी सात जगह पिछड़ रही थी लेकिन इस बार 37 फीसद से 41.85 फीसद वोट हासिल करने के साथ ही पांच विधानसभा केंद्रों में प्रतिशत बढ़ा जबकि एक जगह यथास्थिति रही है। विधायक अशोक घोष के उत्तर हावड़ा में जीत का फर्क 19608 से घट कर 6952, मंत्री अरुप राय के मध्य हावड़ा में 50670 से 6952, जटुलहिरी के शिवपुर में 46404 से 7047, ब्रजमोहन मजुमदार के दक्षिण हावड़ा में तो माकपा ने 31422 से पिछड़ने के बाद 2519 की बढ़त हासिल की। यही हाल सांकराईल का रहा, यहां माकपा ने शीतल सरदार की बढ़त 17859 को लांघ कर 6602 बढ़त प्राप्त की। पांचला में गुलशन मल्लिक भी 12118 को नहीं संभाल सके और यह महज 9960 रह गई।
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि भले ही तृणमूल कांग्रेस के वोट 2006 और 2009 की तुलना में ज्यादा इधर-उधर नहीं हुए हैं। लेकिन उनके चार फीसद वोट माकपा की झोली में गए हैं और भाजपा के लगभग चार फीसद वोट तृणमूल को मिले हैं। इस तरह माकपा के वोट बढ़ गए लेकिन तृणमूल के वोट कुल मिलाकर पहले की तरह ही रहे हैं। सांकराईल और दक्षिण हावड़ा की हार तृणमूल के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि दोनों विधानसभा केंद्र ग्रामीण इलाके में हैं और अगले महीने पहले चरण के पंचायत चुनाव यहां होने वाले हैं। दोनों इलाकों में 20 से 25 फीसद मुसलमान मतदाता भी हैं, चिट फंड घोटाले के पीड़ित लोगों की यहां भारी संख्या भी है। कांग्रेस का मानना है कि सांकराईल में उनके लगभग 32 हजार वोट हैं। तृणमूल कांग्रेस को 61737, माकपा को 68339 और कांग्रेस को यहां 20608 वोट मिले हैं। दक्षिण हावड़ा में तृणमूल कांग्रेस को 70049, माकपा को 72568 और कांग्रेस को 11013 वोट मिले हैं। हालांकि पांचला में भी कांग्रेस ने 17659 वोट हासिल करने में सफलता प्राप्त की लेकिन तृणमूल कांग्रेस 69612, माकपा को 59652 वोट मिले।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हावड़ा की जीत के बाद साफ तौर पर कहा है कि हमें कांग्रेस की नहीं उन्हें हमारी जरूरत है। लेकिन उपचुनाव के नतीजों से लगता है कि अकेले चुनाव लड़ने के कारण जहां कांग्रेस का सफाया हो सकता है वहीं वाममोर्चा को भारी सफलता मिलने की उम्मीद है। इसका खामियाजा सत्ताधारी दल को ही भुगतना होगा क्योंकि हावड़ा में 2008 के पंचायत चुनाव में वाममोर्चा को 62.16, तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस को 17.16 और भाजपा को 1.09 फीसद सफलता मिली थी।  भाजपा-कांग्रेस के बगैर पंचायत चुनाव की वैतरणी पार करना ममता के लिए आसान नहीं होगा।

Tuesday, March 26, 2013

महिला को मर्जी के खिलाफ रंग लगाने पर हो सकती है सात साल तक की जेल



कोलकाता, 26 मार्च (रंजीत लुधियानवी)। मंगलवार को किसी को रंग लगाने से पहले सौ बार सोच लीजीए कहीं लेने के देने न पड़ जाएं। रंगबाज बन कर खुश होने की आवश्यकता नहीं है क्योंकि शिकायत मिलने पर सात साल तक की सजा भी हो सकती है। इसके अलावा किसी भी तरह की शिकायत मिलने पर पुलिसकुछ भी कर सकती है। इसलिए सतर्क रहने में ही फायदा है। कोलकाता पुलिस की ओर सेजारी एक विज्ञप्ति के मुताबिक 27 और 28 मार्च को सुबह सात बजे से लेकर दोपहर एक बजे तक महानगर के 54 रास्तों व 144 धारा जारी किए गए रास्तों पर शोभायात्रा के मौके पर किसी  भी तरह का माइक्रोफोन व्यवहार नहीं किया जा सकेगा। इसके अलावा पुलिस ने चौकसी के व्यापक प्रबंध किए हैं। जिससे किसी भी तरह की अप्रत्याशित घटना को रोका जा सके।
इधर किसी महिला की मर्जी के खिलाफ रंग लगाने पर शिकायत की गई तो आईपीसी की धारा 376 (क) के तहत अभियुक्त व्यक्ति को सात साल तक सश्रम कारावास की सजा भुगतनी पड़ सकती है। इसके साथ ही जुर्माना भी देना पड़ सकता है। मालूम हो कि दी क्रिमिनल आर्डिनेंस ला ( एमेंडमेंट) आर्डिनेंस 2013 के आधार पर बनाए गए नए बलात्कार विरोधी कानून के मुताबिक महिला की छाती पर हाथ लगाना गैर जमानती अपराध है।
इस मामले में शील भंग करने के प्रयास का आरोप दायर हो सकता है।इसकेतहत धारा 354 में शिकायत दर्ज होने पर धारा 354 (क ) और (ख) में मामला दर्ज हगा और अधिकतम पांच साल तक की जेल या जुर्माना या दोनों हो सकता है। जबकि धारा 354 में ग और ड के तहत मामला होने पर एक साल तक जेल जुर्माना या दोनों हो सकता है। इसके साथ ही मानहानि का आरोप भी दर्ज किया जा सकता है। इस कानून के मुताबिक आईपीसी की धारा 509 में तीन साल तक जेल या जुर्माना या दोनों हो सकता है। सभी धाराओं में जमानत नहीं होगी क्योंकि गैर जमानती धाराएं हैं।
दू सरी ओर किसी पुरुष को जबरन रंग लगाने पर भी सजा का प्रावधान है। इस मामले में भारतीय दंड विधान की धारा 341 और 342 के तहत किसी व्यक्ति को जबरन बंधक बनाने और किसी व्यक्ति को एक जगह रोक कर रखने का मामला दायर हो सकता है। धारा 341 के तहत एक महीने की जेल या 500 रुपए जुर्माना या दोनों, और धारा 342 के तहत जेल और एक हजार रुपए जुर्माना हो सकता है। हालांकि दोनों मामले जमानत योग्य हैं।
इसके अलावा कोलकाता पुलिस एक्ट की 68 (घ), 66 धारा और कैलकाता सबर्बन पुलिस एक्ट की धारा 41 (ख) 66 धारा में भी मामला दायर किया जा सकता है। इस मामले में पुलिस 100 रुपए जुर्माना वसूल सकती है और दोनों धाराएं जमानत योग्य हैं।

Sunday, March 24, 2013

सोशल नेटवर्किंग साइट बदल रहे हैं जिंदगी की डगर



पीछे की बेंच पर बैठने वाले बड़ी कक्षा के दादाओं की दहशत के कारण सुमन अब मैदान में ही नहीं जा रहा है। इसके बजाए वह शुन्य में निहारता रहता है और मनोचिकित्सकों के कक्ष में देखा जाता है।
इसी तरह दोस्तों के साथ प्रशांत ने फोटो खिंचवाई थी, लेकिन कंप्यूटर पर उसके साथ वाले सभी मित्रों की तस्वीर काट कर सिर्फ एक लड़की की फोटो जोड़ कर अपलोड कर दी गई। गुस्से में पेपर कटर से ऐसा करने वाले छात्र की ऊंगली ही प्रशांत ने काट दी थी। एक और प्रताड़ना की शिकार नुपूर हालांकि अभी इस सबसे दूर चली  गई है। नेट दुनिया में मित्र बने एक युवक के साथ चैटिंग के माध्यम से पहली बार प्रेम का स्वाद चखा था। परीक्षा के दबाव में व्यस्त होने के कारण वह चैटिंग में टाइम नहीं दे रही थी। नाराज प्रेमी ने धमकी दी कि आपसी बातचीत की सारी बातें जगजाहिर कर देखा। आखिर परिवार और समाज के डर से उसने आत्महत्या कर ली।
उपर की तीन कहानियों में नाम काल्पनिक हैं लेकिन घटनाएं सच्ची है। इन सभी मामलों में अभिभावकों का आरोप है कि नेट बुलिंग या नेट पर प्रताड़ना के कारण ऐसा हो रहा है। आंकड़ों की बात करें तो भारत में इस तरह आन लाइन प्रताड़ना, परेशानी या शर्मिंदगी का शिकार होने वालों में 53 फीसद नेट का प्रयोग करने वाले शामिल हैं। कोलकाता महानगर में ही यह समस्या हर साल 30 फीसद की दर से बढ़ रही है। कुल मिलाकर 32 फीसदी अभिभावकों का कहना है कि उनके बच्चे नेट के कारण परेशानी का सामना करते हैं। ज्यादातर (55 फीसदी) अभिभावकों का मानना है कि नेटवर्किंग साइट के लिए ऐसा हो रहा है। मेट्रो शहरों में कुल मिलाकर 40 फीसद टीन एजर्स मोबाइल फोन पर नेट चलाते हैं। इस तरह हर मिनट नेट अपराध का शिकार होने वालों की संख्या 80 व्यक्ति है।
मालूम हो कि इंटरनेट पर छात्र-छात्राओं में खास तौर पर फेसबुक, आर्कुट, हाई फाइव या अपना सर्कल जैसे सोशल नेटवर्किंग साइट छात्र-छात्राओं को जमकर लुभा रहे हैं। दिन-रात वक्त मिलते ही वे लोग इस पर जुट जाते हैं। इस चक्कर में यार-दोस्त , पढ़ाई-लिखाई सब पीछे छुटती जा रही है। लेकिन इससे ही मानसिक परेशानियां बढ़ रही हैं यह आरोप नया नहीं है। इसमें दिन प्रतिदिन वृद्धि होती जा रही है।
मनोचिकित्सकों का कहना है कि स्कूल में विवाद हो या खेल के मैदान में किसी तरह की बात लोग सीधे नेट पर जा पहुंचते हैं औरदिल की भड़ास निकाल देते हैं। सामने जुबान बंद रहकर मौका मिलते ही ऐसा कुछ अपलोड करने से विरोधी की इमेज देश-दुनिया में तबाह हो जाती है। इस मामले में कोई तस्वीर को खराब करके पेश करता है तो कोई नाराज लोगों का हेट समूह ही बना डालता है। कोई जिससे नाराजगी है उसके बारे में ऐसी -ऐसी बातें लोगों को बताता है कि बेचारे का सिर शर्म से झुकता ही चला जाता है।
एक अंतरराष्ट्रीय संस्था के आंकड़ों के मुताबिक नेट प्रताड़ना में चीन और सिंगापुर के बाद भारत तीसरे स्थान पर पहुंच गया है। यह समस्या सबसे ज्यादा आठ साल  से लेकर 17 साल के छात्र-छात्राओं में देखी जा रही है। कोलकाता जैसे शहर से निकल कर यह समस्या छोटे शहरों तक फैलने लगी है।
मानसिक अवसाद,हिंसक विचारधारा, निष्ठुर मनोभाव से लेकर आत्महत्या तक की घटनाएं नेट पर बेइज्जत होनेके बाद हो रही हैं। कोलकाता के एक अध्यापक का कहना है कि किशोर मन पर इस तरह का प्रभाव बहुत ज्यादा होता है। लेकिन नेट दुनिया में प्रवेश करने से पहले बच्चों को दुनिया के कायदे-कानून की जानकारी हासिल करनी जरुरी है। इसके साथ ही जिम्मेवारी की भी जरुरत है। इसके बजाए होता यह है कि नेट एक नशे की तरह कम उम्र के बच्चों को अपनी चपेट में लेता जा रहा है। मेरा मानना है कि दसवीं कक्षा से पहले किसी भी नेटवर्किंग साइट का हिस्सा नहीं बनना चाहिए। इसके बजाए बच्चों को पढ़ने-लिखने, खेलने-कूदने, गीत-संगीत के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
जबकि महानगर के एक दूसरे अध्यापक का कहना है कि रैगिंग रोकने के लिए जिस तरह कानून बने हुए हैं, नेट पर प्रताड़ना करने वालों के लिए भी वैसे ही कानून की जरुरत है। कई स्कूलों में नेटवर्किंग साइट पर रोक लगाई गई है, हालांकि यह बहुत कम जगह है। शिक्षा विभाग को इस बारे में जागरुक होने की जरुरत है।
लेकिन क्या इसके लिए जागरुकता की कमी है या दोस्तों के चक्कर में फंस कर युवा मन नेट के जाल में फंसता चला जाता है। शिक्षा जगत से जुड़े एक व्यक्ति का मानना है कि जिस तरह दोस्तों के चक्कर में लोग शराब-सिगरेट की लत का शिकार होते हैं,ठीक वैसा ही नेट के मामले में भी हो रहा है। इसके साथ ही सस्ते मोबाइल और पांच रुपए में नेट का प्रयोग जैसी सुविधाएं मिलने के कारण कोई भी आसानी से नेट के चंगुल में फंस जाता है। पहले परिवार वालों की ओर से बच्चों को नशे से दूर रहने के लिए कहा जाता था लेकिन अब अभिभावक खुद ही नेट में व्यस्त रहते हैं तो बच्चों से क्या कहें?
हालांकि खुशी की बात यह है कि समस्या बढ़ने के साथ ही अभिभावक भी जागरुक हो रहे हैं। एक साफ्टवेयर बनाने वाली संस्था की समीक्षा के मुताबिक शहरों में रहने वाले ज्यादातर अभिभावकों को समस्या के बारे में जानकारी है। स्कूलों में भी जागरुकता बढ़ रही है। जिससे उम्मीद है कि आने वाले दिनों में हालात बिगड़ने के बजाए सुधरना शुरू करेंगे।