Monday, February 3, 2014

आम आदमी पार्टी के सदस्यों पर खुफिया एजेंसियों की नजर


रंजीत लुधियानवी
कोलकाता, 2 फरवरी । कोना में आम आदमी पार्टी की ओर से सदस्यता अभियान चलाया जा रहा है, डनलप में कितने लोग इस दल में शामिल हुए और आगामी चार फरवरी को कालेज स्कवायर से निकलने वाली रैली में कितने लोग शामिल होंगे, इस बारे में खुफिया एजेंसियों की खास नजर है।
सूत्रों से पता चला है कि केंद्र सरकार की इंटेलिजेंस ब्यूरो की राज्य शाखा (आईबी) की ओर से सवालों की एक सूची तैयार की गई है।इसके मुताबिक पश्चिम बंगाल में अब तक कितने लोग आम आदमी पार्टी के सदस्य बन गए हैं? कितने लोग अभी तक दूरी कायम रख कर दल को नैतिक समर्थन दे रहे हैं? इनमें से कोई खास आदमी तो नहीं है, अगर है तो उसकी राजनीतिक पृष्ठभूमि क्या रही है? राज्य में किस-किस जिले में कार्यालय बनाए गए हैं? जिला शाखाओं की जिम्मेवारी किसके पास है? ऐसे लोगों का संपूर्ण बायोडाटा कि उनका परिचय क्या है, समाज में क्या स्थिति है, क्या कामकाज करते हैं, शामिल है।
इसके साथ ही सवालों की लड़ी में यह भी शामिल है कि लोकसभा में कितनी सीटों पर आप चुनाव लड़ सकता है? इतना ही नहीं किस दल के खिलाफ उम्मीदवार उतारने की तैयारी की जा रही है। किस राजनीतिक दल का समर्थन लेकर चुनाव लड़ने की कोशिश चल रही है। क्या राज्य की सभी 42 सीटों पर मुकाबला करेंगे और लोकसभा में किसे टिकट दिया जा सकता है।
सवालों की सूची मेंं यह भी शामिल है कि अकेले चुनाव लड़ने पर उन्हें कितनी सीटें मिल सकती है? सीटें अगर नहीं मिलती हैं तो वोट काटने पर तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, माकपा, भाजपा को किसे कितना नुकसान पहुंच सकता है। यह वोट कितने फीसद तक घट सकते हैं। उम्मीदवारों की सूची में कितने खास लोग शामिल हो सकते हैं और उन पर लोगों की क्या प्रतिक्रिया होगी? इतना ही नहीं राज्य में किस संस्था,राजनीतिक और गैर राजनीतिक दल की ओर से उन्हें समर्थन किया जा रहा है? उन्हें रकम कहां से मिल रही है। बताया जाता है कि फरवरी में ही यह रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेज दी जाएगी।
सूत्रोें का कहना है कि सवालों के जवाब तलाशने के लिए खुफिया विभाग ने गुप्त तरीके से राज्य के आम आदमी पार्टी के सदस्यों की गतिविधियों पर नजर रखने के साथ ही कई विभिन्न स्तर के नेताओं से बातचीत भी की है। हालांकि सूत्रों का कहना है कि अभी सारे तथ्य इकट्ठा नहीं किए जा सके हैं। इसका कारण यह है कि लोकसभा के उम्मीदवारों की सूची तैयार होने में अभी कुछ समय लग सकता है। माना जा रहा है कि फरवरी के मध्य तक उम्मीदवारोे ं की सूची तैयार हो जाएगी। इसके बाद केंद्र को रिपोर्ट भेजी जाएगी।
सूत्रों का कहना है कि कई खास लोगों के आप से संबंध के बारे में आईबी को जानकारी मिली है। इसके तहत राज्य का एक बुद्धीजीवी शामिल है। बताया जाता है कि 30 जनवरी को वे ब्रिगेड की तृणमूल कांग्रेस की रैली में मंच पर सुशोभित थे। उन्होंने दल से कहा है कि वे नैतिक समर्थन देते रहेंगे। जबकि एक प्रसिद्ध गायिका और विवादों में घिरे रहने वाले आईपीएस अधिकारी भी शामिल हैं।
सूत्रों के मुताबिक आम आदमी पार्टी के बारे में हासिल की जाने वाली जानकारी कोई नई बात नहीं है। सदैव से यह प्रचलन रहा है कि किसी भी नई संस्था, संगठन या दल के गठन के बाद खुफिया विभाग को उसका ब्यौरा इकट्ठा करना पड़ता है। भले ही वह राजनीतिक संगठन हो या गैर राजनीतिक संगठन, इससे कोई सरोकार नहीं है। इसलिए राज्य में नए दल के गठन को लेकर लोकसभा चुनाव से पहले ब्यौरा इकट्ठा करना रुटीन बात है।
हालांकि दूसरी ओर कुछ लोगों का कहना है कि आगामी लोकसभा चुनाव जिस हालत में हो रहे हैं, उसमें स्पष्ट है कि किसी भी दल को बहुमत नहीं मिलेगा। ऐसे में क्षेत्रीय दलों के साथ ही आप की भी अहम भूमिका हो सकती है। एक व्यक्ति के मुताबिक इस साल होने वाले लोकसभा चुनाव में 60 फीसद से ज्यादा युवा समाज के   मतदाता शामिल हैं। तमाम सोशल नेटवर्किंग साइट का इस्तेमाल करके आप ने उन्हें अपने साथ जोड़ने में सफलता हासिल की है। नई दिल्ली विधानसभा के परिणाम इसकी ताजा मिसाल हैं। इसका ही नतीजा है कि कई सर्वे में मोदी के बाद अरविंद केजरीवाल राहुल गांधी को पछाड़ कर प्रधानमंत्री की दौड़ में दूसरे स्थान पर चल रहे हैं।
कई राजनीतिक विशेषज्ञ मानते हैं कि चुनाव में भ्रष्टाचार एक बड़ा मुद्दा होगा। आप की ओर से प्रकाशित बेईमानों की सूची में जहां कांग्रेस के बड़े नाम शामिल हैं वहीं भाजपा भी इससे अछुती नहीं है। समाजवादी पार्टी से लेकर बहुजन समाज पार्टी के लोग इसमें शामिल हैं। देश में 350 सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान करने के बाद सभी राजनीतिक दलों के खिलाफ मोर्चा खोलने से माना जा रहा है कि कांग्रेस का वोट बैंक तो प्रभावित होगा ही दूसरे दल भी इसके प्रभाव से नहीं बच सकेंगे।
ऐसे हालात में आप की कालेज स्कवायरकी रैली निकलने वाली है। राज्य प्रशासन के एक अधिकारी के मुताबिक आप के गठन के बाद एक बार रुटीन पड़ताल की गई थी, अब लोकसभा के पहले दल की पूरी जन्मपत्री तैयार की जा रही है। 

Thursday, January 16, 2014

कोचिंग कारोबार तले अंधेरा

  भारत में ट्यूशन उद्योग के अध्ययन पर आधारित एशिया डेवलपमेंट बैंक की इस रिपोर्ट के अनुसार आज शहरों में अपने बच्चों की ट्यूशन पर अभिभावक प्रतिमाह औसत 2349 रुपए और गांवों में 1456 रुपए खर्च करते हैं। तथ्य यह है कि इंजीनियरिंग, डाक्टरी, मैनेजमेंट या अन्य किसी भी पेशेवर कालेज में प्रवेश के लिए आजकल ट्यूशन लेना लगभग जरूरी हो चला है। पेशेवर कालेज ही क्यों, प्रशासनिक सेवा, फौज या सरकारी स्कूल में मास्टर की नौकरी पाने के लिए भी कोचिंग इंस्टिट्यूट की शरण लेना अब एक अनिवार्य शर्त बन चुकी है। एसोसिएटेड चेम्बर आफ कामर्स इंडस्ट्री आफ इण्डिया (एसोचेम) द्वारा दस बड़े नगरों में कराए अध्ययन की रिपोर्ट से इस बात को और साफ समझा जा सकता है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, चेन्नई, बेंगलुरू, जयपुर, हैदराबाद, अहमदाबाद, लखनऊ और चंडीगढ़ में किये सर्वे से चौंकाने वाला सच सामने आया। इन नगरों में प्राइमरी कक्षा के 87 फीसदी और सेकेंडरी स्तर के 95 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन पढ़ते हैं।
उक्त तथ्यों से तो यही निष्कर्ष निकलता है कि अच्छी स्कूली शिक्षा, पेशेवर पाठ्यक्रमों और बेहतर नौकरियों की होड़ से गरीब और निम्न मध्य वर्ग को सुनियोजित तरीके से बाहर किया जा रहा है। पैसे की ताकत ने आर्थिक दृष्टि से पिछड़ी जमात के बच्चों के लिए प्रतिष्ठित संस्थानों में दाखिला लेना या अच्छी नौकरी पाना असंभव बना दिया है। आज शिक्षा का उद्देश्य छात्रों को अच्छा इनसान बनाना नहीं, नौकरी के बाजार के काबिल बनाना है। अच्छी नौकरी पाने के लिए अच्छे संस्थान में प्रवेश पाना पहली शर्त है और प्रवेश के लिए अच्छे कोचिंग इंस्टिट्यूट या महंगी ट्यूशन पढऩा अनिवार्य है। ट्यूशन के लिए मोटा पैसा चाहिए और जिसकी हैसियत ट्यूशन फीस चुकाने की नहीं है, वह खुद-ब- खुद अच्छी नौकरी की होड़ से बाहर हो जाता है।
ट्यूशन में फोकस ज्ञानवर्धन नहीं होता बल्कि वहां परीक्षा पास करने के गुर सिखाए जाते हैं और इसकी मोटी कीमत वसूली जाती है। भारत में ट्यूशन फीस एक से चार हजार रुपये महीने के बीच है जबकि व्यक्तिगत ट्यूटर हजार से पांच हजार रुपए घंटे के बीच लेते हैं। मां-बाप की जैसी हैसियत होती है, वे अपने बच्चों को वैसी ही ट्यूशन लगवाते हैं। एक अध्ययन के अनुसार आज मध्य आय वर्ग के लोग अपनी आमदनी का एक-तिहाई पैसा बच्चों की ट्यूशन पर खर्च कर रहे हैं। उनका एक ही सपना होता है कि बच्चा कैसे भी डाक्टर, इंजीनियर, एमबीए बन जाए।
कहने को ट्यूशन या कोचिंग को संगठित क्षेत्र में नहीं गिना जाता लेकिन जानकारों का मानना है कि आज यह धंधा दुनिया के सबसे तेजी से फल-फूल रहे प्रथम 16 कारोबारों में शुमार है। आज दुनिया में कोचिंग का कारोबार लगभग 63 खरब रुपये का है और इसकी विकास दर सात फीसदी है। भारत ट्यूशन बाजार का सरगना है। फिलहाल हमारे देश में इस धंधे से सालाना लगभग 14 अरब रुपये की कमाई हो रही है जो 2015 में बढ़कर 23.86 अरब हो जाने की सम्भावना है। अब अनेक बड़े औद्योगिक घराने भी कोचिंग के काम में उतर आए हैं।
स्कूलों में अच्छे शिक्षकों का अभाव, शिक्षकों द्वारा कक्षा में पढ़ाने के बजाय ट्यूशन पर ध्यान देने, कक्षा में छात्रों की बढ़ती संख्या, अभिभावकों के पास समय की कमी, पेशेवर संस्थानों में प्रवेश की गारंटी तथा बच्चों की मानसिक असुरक्षा भी कुछ अन्य कारण हैं। तीन दशक पहले इंजीनियरिंग और मेडिकल कालेजों में प्रवेश पाने वाले अधिकांश छात्र सरकारी स्कूलों के होते थे। अब स्थिति उलट गई है। सरकार का ध्यान सरकारी स्कूलों की शिक्षा की गुणवत्ता पर बिल्कुल नहीं है। सर्वशिक्षा अभियान में भी गुणवत्ता की उपेक्षा की गई है। निजी स्कूल तो मुनाफे की अवधारणा पर ही टिके हैं। ऐसे में ट्यूशन के धंधे को फलने-फूलने से कौन रोक सकता है ?
पिछले पांच साल में बड़ी संख्या में निजी कालेज और विश्वविद्यालय खुले, फिर भी शिक्षा का स्तर उठ नहीं पाया। छात्रों को अच्छी नौकरी पाने या अच्छे संस्थानों में प्रवेश के लिए ट्यूशन की बैसाखी का सहारा लेना ही पड़ता है। जिन संस्थानों को हम सर्वश्रेष्ठ मानते हैं, दुनिया के नक्शे पर उनकी कोई पहचान नहीं है। आज विश्व के श्रेष्ठ दो सौ विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षा संस्थानों में से एक भी भारतीय नहीं है। जिन आईआईटी और आईआईएम पर हम इतराते हैं, वे भी इस सूची में स्थान बनाने में विफल रहे हैं। दूसरी ओर ब्रिक्स देशों में चीन के सात तथा ब्राजील, रूस और दक्षिण अफ्रीका के एक-एक विश्वविद्यालय इस सूची में आते हैं। एक अध्ययन के अनुसार देश के 75 फीसदी टेक्निकल ग्रेजुएट और 90 प्रतिशत जनरल ग्रेजुएट नौकरी पाने लायक नहीं हैं। सा$फ है जब हमारे यहां उच्च शिक्षा का स्तर ऐसा है तब दुनिया के श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों में शुमार होने की कल्पना कैसे की जा सकती है?
उच्च शिक्षा और पेशेवर संस्थानों में ग्रामीण इलाकों और पिछड़े वर्ग की दुर्दशा को यूं भी समझा जा सकता है। सन् 2008 में उच्च शिक्षा संस्थानों में ग्रामीण इलाकों के छात्रों की संख्या 45 फीसदी थी जबकि देश की लगभग 70 प्रतिशत आबादी गांवों में रहती थी। जनजातियों, अनुसूचित जातियों और पिछड़ी जातियों का प्रतिशत क्रमश: चार, 13.5 और 35 था जो उनकी जनसंख्या से नीचे था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में कितनी असमानता है और ट्यूशन के धंधे से यह असमानता घटने की बजाय और बढ़ रही है।  

Monday, December 2, 2013

सबसे काबिल हैं पंजाबी, पश्चिम बंगाल फिसड्डी


 देश में रोजगार की दृष्टि से सबसे अधिक योग्य (यानी काबिल) लोग पंजाबी हैं जबकि सबसे कम योग्य (फिसड्डी) पश्चिम बंगाल के हैं। भारतीय उद्योग परिसंघ द्वारा जारी इंडिया स्किल रिपोर्ट 2014 से यह तथ्य सामने आया है।

श्रम एवं रोजगार मंत्रालय तथा सी.आई. आई. एवं मानव संसाधन विकास मंत्रालय द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित तीसरे राष्ट्रीय कौशल विकास सम्मेलन में यह रिपोर्ट जारी की गई। रिपोर्ट के अनुसार देश में रोजगार की दृष्टि से योग्य लोगों में 42.47 प्रतिशत लोग पंजाब से आते हैं जबकि तमिलनाडु से 36.13 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश से 30.44 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश से 33.4 प्रतिशत, दिल्ली से 29.68 प्रतिशत, कर्नाटक से 17.63 प्रतिशत, ओडिशा से 12.43 प्रतिशत एवं पश्चिम बंगाल से 4.23 प्रतिशत लोग रोजगार की दृष्टि से योग्य हैं।

रिपोर्ट के अनुसार उद्योग जगत में कार्यरत महिलाओं तथा पुरुषों के अनुपात में काफी अंतर है लेकिन रोजगार की दृष्टि से योग्य महिलाएं सर्वाधिक पंजाब से हैं जबकि सबसे कम योग्य महिलाएं पश्चिम बंगाल में हैं। रिपोर्ट के अनुसार रोजगार की दृष्टि से सर्वाधिक योग्य पुरुष तमिलनाडु में हैं जबकि सबसे कम योग्य पुरुष पश्चिम बंगाल में हैं।

Thursday, November 21, 2013

छोटे परदे की बदलती दुनिया



-विश्व टेलीविजन दिवस-

आज विश्व टेलीविजन दिवस है. यह दिन है न सिर्फ टेलीविजन की विकासयात्रा को याद करने का, बल्कि यह समझने का भी कि टेलीविजन ने दुनिया को बदलने में किस तरह अपनी भूमिका निभायी है. टेलीविजन के अब तक के सफर, समाज में उसकी भूमिका और उसमें आ रहे बदलावों को समेटने की कोशिश करता आज का नॉलेज

आज की पीढ़ी को शायद यह विश्वास नहीं होगा कि महज दोत्नतीन दशक पहले लोग टेलीविजन पर कार्यक्रम देखने के लिए आसत्नपड़ोस के घरों में जाया करते थे. जिस तरह आज शहरों और सुविधासंपन्न गांवों में तकरीबन हर घर में टेलीविजन मौजूद है, ऐसा उस समय नहीं हुआ करता था. अस्सी के दशक में देश में जब टेलीविजन ने उच्चवर्गीय घरों के दायरे से निकलते हुए मध्यवर्गीय परिवारों में प्रवेश किया, तो किसी को यह अंदाजा नहीं रहा होगा कि इतनी जल्दी यह इतना लोकप्रिय हो जायेगा. 1990 के महज एक दशक की अवधि में यह तकरीबन प्रत्येक मध्यवर्गीय घरों में लोकप्रिय हो गया.

भारत में भले ही टेलीविजन की शुरुआत 1959 में हो चुकी थी, लेकिन इसकी लोकप्रियता 1980 के दशक में कायम हुई. रामानंद सागर निर्देशित धारावाहिक ‘रामायण’ , 1982 के एशियाई खेलों और 1987 में भारत में आयोजित ‘विश्व कप क्रिकेट’ ने भारत में टेलीविजन की लोकप्रियता को बहुत हद तक बढ़ावा देने में अग्रणी भूमिका निभायी. धारावाहिक ‘रामायण’ के प्रसारण के समय तो सड़कों पर सन्नाटा छा जाता था.

इसे टेलीविजन की लोकप्रियता ही कहा जायेगा कि इस धारावाहिक में ‘भगवान राम’ का किरदार निभानेवाले अरुण गोविल को लोग उनके नाम से कम, बल्कि ‘भगवान राम’ की भूमिका के लिए अधिक जानने लगे.  तकरीबन उसी दौर में ‘बुनियाद’ और ‘हम लोग’ जैसे धारावाहिकों, जिन्हें भारत का शुरुआती शोप ऑपेरा भी कहा जा सकता है, ने भारत में टेलीविजन की दुनिया को एकदम से बदल दिया. क्रिकेट खेल के सीधे प्रसारण ने लोगों में एक अलग तरह का रोमांच पैदा कर दिया. हालांकि उस दौर में रंगीन टेलीविजन की शुरुआत हो चुकी थी, लेकिन ब्लैक एंड व्हाइट की तुलना में ज्यादा कीमती होने के चलते इसकी मौजूदगी बहुत कम ही घरों में थी. लेकिन दो दशकों से कम समय में भारत में  टेलीविजन ने संचार के दूसरे साधनों के समान ही अविश्वसनीय प्रगति की है. इस प्रगति की कहानी में दूरदर्शन की कहानी अभिन्न तरीके से जुड़ी हुई है.

दूरदर्शन की उपलब्धि

दूरदर्शन ने देश में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन, राष्ट्रीय एकता को बढ़ावा देने और वैज्ञानिक सोच को एक नयी दिशा प्रदान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. इसने देश में लंबे समय तक पब्लिक ब्रॉडकास्टर की भूमिका निभायी और अपनी तमाम खामियों के बावजूद यह काम आज भी कर रहा है. दूरदर्शन का पहला प्रसारण 15 सितंबर, 1959 को प्रयोगात्मक आधार पर आधे घंटे के लिए शैक्षिक और विकास कार्यक्रमों के रूप में शुरू किया गया था. उस समय दूरदर्शन का प्रसारण सप्ताह में महज तीन दिन आधात्नआधा घंटे ही होता था. उस समय इसे ‘टेलीविजन इंडिया’ के नाम से जाना जाता था. वर्ष 1975 में इसका हिंदी नामकरण ‘दूरदर्शन’ नाम से किया गया.

दूरदर्शन ने धीरे-धीरे अपने पैर पसारे और दिल्ली में 1965, मुंबई में 1972, कोलकाता और  चेन्नई में 1975 में इसका प्रसारण शुरू किया गया. 15 अगस्त, 1965 को पहले समाचार बुलेटिन का प्रसारण दूरदर्शन से किया गया था. दूरदर्शन के नेशनल चैनल पर रात साढ़े आठ बजे प्रसारित होने वाला राष्ट्रीय समाचार बुलेटिन तकरीबन उसी समय से आज भी जारी है. 1982 में दिल्ली में आयोजित एशियाई खेलों के प्रसारण से श्वेत और श्याम दिखने वाला दूरदर्शन रंगीन हो गया.

टेलीविजन की कहानी

कई लोगों की कड़ी मेहनत और तकरीबन तीन दशक के रिसर्च के बाद टेलीविजन का आविष्कार हुआ. सबसे पहले 1875 में बोस्टन के जॉर्ज कैरे ने सुझाव दिया था कि किसी चित्र के सारे अवयवों या घटकों को एक साथ इलेक्ट्रॉनिक तरीके से भेजा जा सकता है. इसी विचार को आगे बढ़ाते हुए 1887 में एडवियर्ड मायब्रिज ने इनसान और जानवरों के हलचल की फोटोग्राफिक रिकॉर्डिग की. इसे उन्होंने लोकोमोशन नाम दिया. इसके बाद ऑगस्टे और लुईस लुमियर नाम के दो भाईयों ने सिनेमैटोग्राफ नाम की संरचना का विचार रखा, जिसमें एक साथ कैमरा, प्रोजेक्टर और प्रिंटर था. उन दोनों ने 1895 में पहली पब्लिक फिल्म बनायी. 1907 में रूसी वैज्ञानिक बोरिस रोसिंग ने पहले एक प्रयोगात्मक टेलीविजन प्रणाली के रिसीवर में एक सीआरटी का उपयोग किया और इससे टीवी को नया रूप मिला. फिर लंदन में स्कॉटिश आविष्कारक जॉन लोगी बेयर्ड चलती छवियों के संचरण का प्रदर्शन करने में सफल रहे. बेयर्ड स्कैनिंग डिस्क ने एक रंग छवियों का 30 लाइनों को संकल्प कर उसे प्रस्तुत किया. इस तरह टीवी के आविष्कार में अनेक वैज्ञानिकों ने अहम रोल अदा किया, लेकिन ब्लादीमीर ज्योरकिन को ही ‘टीवी का पिता’ कहा जाता है. उन्होंने 1923 में आइकोनोस्कोप की खोज की. यह ऐसी ट्यूब थी, जो एक चित्र को इलेक्ट्रॉनिक तरीके से किसी चित्र से जोड़ती है. इसके कुछ साल बाद ही उन्होंने काइनस्कोप यानी कैथोडत्नरे ट्यूब खोज निकाली. इसकी मदद से उन्होंने एक स्क्वायर इंच का पहला टीवी बनाया. यह ब्लैक एंड व्हाइट टीवी थी. इसके बाद रंगीन टेलीविजन की तकनीक को खोजने में तकरीबन बीस वर्ष लग गये. दुनिया की पहली रंगीन टेलीविजन 1953 में बनी.

टेलीविजन प्रसारण में बीबीसी ने पहला टीवी प्रसारण केंद्र बनाते हुए 1932 में अपनी सेवा शुरू की. 22 अगस्त, 1932 को लंदन के ब्रॉडकास्ट हाउस से पहली बार टीवी का प्रायोगिक प्रसारण शुरू हुआ और 2 नवंबर, 1932 को बीबीसी ने एलेक्जेंडरा राजमहल से दुनिया का पहला नियमित टीवी चैनल का प्रसारण शुरू कर दिया था. इसके पांच साल बाद राजा जॉर्ज छठवें ने राज्याभिषेक समारोह को ब्रिटेन की जनता तक सीधे पहुंचाने के लिए पहली बार ओवी वैन का इस्तेमाल किया. उसके बाद 12 जून 1937 को पहली बार विंबल्डन टेनिस का सीधा प्रसारण दिखाया गया था. 9 नवंबर 1947 को टेलीविजन के इतिहास में पहली बार टेली रिकार्डिग कर उसी कार्यक्रम का रात में प्रसारण किया गया. वहीं दूसरी तरफ अमेरिका में 1946 में एबीसी टेलीविजन नेटवर्क का उदय हुआ. पहली बार रंगीन टेलीविजन का अविर्भाव 17 दिसंबर 1953 को अमेरिका में हुआ और विश्व का पहला रंगीन विज्ञापन कैप्सूल 6 अगस्त 1953 को न्यूयॉर्क में प्रसारित हुआ था. 1967 में पूरी दुनिया की करोड़ों जनता ने अमेरिका की नेटवर्क टीवी के जरिये चांद पर गये दोनों आतंरिक्ष यात्रियों को चांद पर उतरते देखा. इसके बाद 1976 में पहली बार केबल नेटवर्क के जरिये टेलीविजन प्रसारण का इतिहास कायम किया गया. 1979 में सिर्फ खेलकूद का विशेष टीवी नेटवर्क इएसपीएन स्थापित हुआ.

पिछले दो दशकों में टेलीविजन की दुनिया ने आश्चर्यजनक प्रगति की है. इस प्रगति में न सिर्फ नयेत्ननये टेलीविजन सेटों का आविष्कार शामिल है, बल्कि टेलीविजन देखने का पूरा तरीका ही बदल गया है. अब टेलीविजन मोबाइल फोन और इंटरनेट पर भी उपलब्ध है. आज टेलीविजन हाइ डिफिनिशन हो चुका है, थ्री डाइमेंशनल हो गया है. वास्तव में अपनी शुरुआत के 80 वर्षो में टेलीविजन की प्रगति आश्चर्यचकित करती है, लेकिन आनेवाले समय में इसे कंप्यूटर से और कड़ी चुनौती मिलना तय है. बहरहाल दुनिया में संचार के तरीके को बदलने में इसने जो भूमिका निभायी है, वह अविस्मरणीय है.

टेलीविजन संचार का सबसे सशक्त माध्यम है. लोगों को दुनियाभर की जानकारी देने में टेलीविजन की अहम भूमिका को देखते हुए 17 दिसंबर, 1996 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 नवंबर को हर वर्ष विश्व टेलीविजन दिवस के तौर पर मनाने का फैसला किया. 21 नवंबर की तारीख इसलिए चुनी गयी, क्योंकि इसी दिन पहले विश्व टेलीविजन फोरम की बैठक हुई थी. माना जाता है कि विश्व टेलीविजन दिवस मनाने का कारण यह भी रहा कि टेलीविजन के द्वारा एकत्नदूसरे देशों की शांति, सुरक्षा, आर्थिक सामाजिक विकास व संस्कृति को जाना व समझा जा सके.

 इनकी निगाह में टेलीविजन

बान की-मून, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव

टेलीविजन ने पूरे विश्व में लोगों के रहन-सहन के तौर-तरीकों और उनकी जिंदगी को पूरी तरह से बदल दिया है. समानता आधारित कार्यक्रमों के माध्यम से, टेलीविजन ने वैश्विक मुद्दों को रेखांकित किया है और समुदायों एवं परिवारों के बीच संघर्षो और उम्मीदों को समझने में मददगार साबित हुआ है. संयुक्त राष्ट्र यह कामना करता है कि प्रसारकों के सहयोग से यह समाज को सूचना और शिक्षा मुहैया कराने के साथ-साथ हमारे लिए एक बेहतर दुनिया के निर्माण की ओर अग्रसर होगा.

 लेक वालेसा, पोलैंड के पूर्व राष्ट्रपति (1990-95),

नोबेल विजेता

लोकतंत्र की एक ऐसी आधारशिला, जिससे असीमित सूचना तक पहुंच कायम होती है. टेलीविजन चैनलों का बहुलवाद (प्लूरलिज्म) इनमें से इसका एक आवश्यक और अनिवार्य तत्व है.

 कोफी अन्नान, संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव (1997-2006)

टेलीविजन लोगों की भलाई के लिए एक जबरदस्त ताकत हो सकता है. इससे जुड़े हुए लोगों को यह दुनियाभर में बड़ी संख्या में शिक्षा मुहैया करा सकता है. यह इसे प्रदर्शित कर सकता है कि हम अपने पड़ोस, नजदीक और दूर स्थित लोगों के साथ किस तरह से जुड़े हुए हैं. और, यह उस कोने में पसरे अंधेरे में रोशनी फैला सकता है, जहां अज्ञान और नफरत ने अपने पैर फैला रखे हैं. ऐसे कंटेंट तैयार करते हुए, जो न केवल ताकतवर, बल्कि कमजोर लोगों की कहानी को भी बयां करते होंत्न आपसी समझ और धैर्य को बढ़ावा देने के रूप में टेलीविजन उद्योग की अहम भूमिका है. इसका फायदा न केवल दुनिया के धनी देशों को  हुआ है, बल्कि उन सभी विकासशील देशों को भी इससे बहुत फायदा हुआ है, जिसमें दुनिया की ज्यादातर आबादी रहती है.

दूरदर्शन की यात्रा

आकाशवाणी के भाग के रूप में टेलीविजन सेवा की नियमित शुरुआत दिल्ली से वर्ष 1965 से हुई थी.  दूरदर्शन की स्थापना 15 सितंबर, 1976 को हुई. उसके बाद रंगीन प्रसारण की शुरुआत नयी दिल्ली में 1982 के एशियाई खेलों के दौरान हुई. इसके बाद तो देश में प्रसारण क्षेत्र में बड़ी क्रांति आ गयी. दूरदर्शन का तेजी से विकास हुआ और 1984 में देश में तकरीबन हर दिन एक ट्रांसमीटर लगाया गया. इस मामले में कुछ महत्वपूर्ण मोड़ को इस तरह से रेखांकित किया जा सकता है.

- दूसरे चैनल की शुरुआत : दिल्ली (9 अगस्त, 1984), मुंबई (1 मई, 1985), चेन्नई (19 नवंबर, 1987), कोलकाता (1 जुलाई, 1988)

- मेट्रो चैनल शुरू करने के लिए एक दूसरे चैनल की नेटवर्किग  : 26 जनवरी, 1993

-अंतरराष्ट्रीय चैनल डीडी इंडिया की शुरुआत : 14 मार्च, 1995

त्नप्रसार भारती का गठन (भारतीय प्रसारण निगम) : 23 नवंबर, 1997

-खेल चैनल डीडी स्पोर्ट्स की शुरुआत : 18 मार्च, 1999

-संवर्धन/ सांस्कृतिक चैनल की शुरुआत : 26 जनवरी, 2002

-24 घंटे के समाचार चैनल डीडी न्यूज की शुरुआत : 3 नवंबर, 2002



-निशुल्क डीटीएच सेवा डीडी डाइरेक्ट प्लस की शुरुआत : 16 दिसंबर, 2004

Friday, September 13, 2013

आधार के आंकड़े निराशाजनक, समयसीमा बढ़ाने की होगी सिफारिश



रंजीत लुधियानवी

कोलकाता, 12 सितंबर। आगामी 2014 की फरवरी तक सभी लोगों का आधार कार्ड बनाने की समयसीमा राज्य सरकार ने तय कर दी है। इस दौरान राज्य के सभी जिलों को तीन भागों में बांट कर आधार कार्ड बनाने का काम पूरा करने का फैसला किया गया है। इसके साथ ही जिन लोगों के कार्ड के लिए तस्वीरें खींचने का काम हो चुका है और अभी तक कार्ड नहीं मिला है। ऐसे लोगों के लिए ई-आधार कार्ड चालू करने का निर्णय किया गया है। अभी तक आधार कार्ड के दायरे में नहीं आने वालों को कार्ड बनाने के लिए पंचायत इलाके के नागरिकों को बीडीओ कार्यालय, नगर निगम इलाके में रहने वालों के लिए निगम कार्यालय और नगरपालिका इलाके में रहने वलों के लिए संबंधित बोरो या वार्ड कार्यालय में जाकर फार्म में खुद से संबंधित 15 आवश्यक आंकड़े दर्ज करवाने होंगे। ऐसा करने के लिए अपने पास पहचान पत्र (आइडेंटी प्रूफ) और रहने का रिहायशी प्रमाण पत्र (एड्रेस प्रूफ) लेकर जाना होगा। इसके बाद यह पता लगाने का प्रयास करेंकि आपके इलाके में आधार कार्ड के लिए कब फोटो खींचने वाले  शिविर का आयोजन किया जा रहा है। तय तिथि पर फोटो और बायोमैट्रिक आंकड़ें जमा करवा दें। हालांकि लौटने से पहले एकनालेजमेंट रसीद जरूर प्राप्त कर लें। तीन महीने तक डाक के माध्यम से कार्ड आपके घर पहुंच जाना चाहिए। ऐसे नहीं होने पर डब्लूडब्लूडब्लू डाट यूआईडीएआआई डाट आइएन वेबसाइट के ई आधार पोर्टल पर प्राप्त की गई रसीद के नंबर से स्टेटस की जांच कर सकते हैं।
मालूम हो कि आगामी एक नवंबर से कोलकाता, हावड़ा और कूचबिहार जिलों में रसोई गैस पर सबसिडी सीधे ग्राहक के बैंक खाते में जमा हो जाएगी। इसके लिए ग्राहक के पास आधार कार्ड या आधार नंबर होना चाहिए। बगैर कार्ड या नंबर वाले उपभोक्ताओं को 31 जनवरी तक सबसिडी वाला सिलेंडर मिलता रहेगा। इसके बाद जब तक आधार कार्ड या नंबर प्राप्त नहीं होता है, बगैर सबसिडी वाला सिलेंडर खरीदना होगा।
अगर आप खुशकिस्मत हैं और आधार के दायरे में आ चुके हैं, तब रसोई गैस डिस्ट्रीब्यूटर से मुफ्त में दो फार्म हासिल करें, एक फार्म में आधार कार्ड नंबर समेत दूसरे आंकड़े भर कर डिस्ट्रीब्यूटर के पास जमा करें। इसके साथ आधार कार्ड की प्रतिलिपि (जेराक्स) जमा देना न भूलें। बैंक के लिए दूसरा फार्म भरकर जिस बैंक में आप सबसिडी लेना चाहते हैं, बैंक खाता और आधार नंबर लिखकर जमा कर दें। डिस्ट्रीब्यूटर के कार्यालय में बैंक का फार्म एक बाक्स  में डाल दें या सीधे जाकर बैंक में जमा कर सकते हैं। इसके बाद आपका आधार नंबर रसोई गैस के कंजुमर नंबर से साथ जुड़ जाएगा। इसी तरह आपका आधार नंबर बैंक खाते के साथ लिंक हो जाएगा।
परियोजना के चालू होने के बाद पहला गैस सिलेंडर बुक करते ही संबंधित बैंक खाते में 490 रुपए जमा हो जाएंगे। जब आपके घर सिलेंडर आएगा, तब आपको बाजार दर पर सिलेंडर के लिए कीमत देनी होगी। इस महीने सिलेंडर की कीमत कोलकाता में 967 रुपए हैं।   सबसिडी वाले सिलेंडर के लिए आपको 412 रुपए 50 पैसे देने चाहिए, जबकि भुगतान ज्यादा का कर रहे हैं, इसलिए 64 रुपए 50 पैसे सिलेंडर मिलने के बाद आपके खाते में जमा हो जाएंगे। इसके बाद दूसरे सिलेंडर के दौरान बुकिंग करते ही सबसिडी की सारी रकम आपके खाते में जमा हो जाएगी। एक वित्त वर्ष में आपके एक अप्रैल से लेकर 31 मार्च की अवधि तक सबसिडी वाले नौ सिलेंडर मिलेंगे, इसके बाद खरीदे जाने वाले सिलेंडर पर आपको सबसिडी नहीं मिलेगी।
आंकड़ों के मुताबिक 11 मार्च 2013 तक कोलकाता में 55.46, हावड़ा में 60.50 फीसद और हुगली में 46.57 लोगों को आधार कार्ड मिले हैं, जबकि यहां 31 अक्तूबर तक काम पूरा होने की समयसीमा है। उत्तर चौबीस परगना में 7.29 फीसद और दक्षिण चौबीस परगना में 21.58 फीसद लोगों के कार्ड बने हैं, यहां 28 फरवरी तक कार्ड बनाने की समय सीमा तय की गई है। हालांकि सरकारी आंकड़ों के मुताबिक आधार कार्ड के दायरे में आने वाले जिलों में पहला नंबर हावड़ा जिले का है। यहां सबसे ज्यादा 83.9 फीसद लोग इस दायरे में आ चुके हैं। जबकि उत्तर दिनाजपुर में 8.3 फीसद, बांकुड़ा में 13.9 फीसद, कूचबिहार में 77 फीसद, जलपाईगुड़ी में 23.3 फीसद, दार्जिलिंग में 25 फीसद, दक्षिण दिनाजपुर में 50.6 फीसद, मालदा में 42.4 फीसद, हुगली में 79 फीसद, कोलकाता में 63.37 फीसद, मुर्शिदाबाद में 56 फीसद , पूर्व मेदिनीपुर जिले में 47.2 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले में 36.1 फीसद , बर्दवान जिले में 3.8, नदिया जिले में 34.5 फीसद,  वीरभूम 30.6 फीसद, उत्तर चौबीस परगना जिले में 27.9 फीसद, पश्चिम मेदिनीपुर जिले में 24.6 फीसद लोग आधार के दायरे में आ चुके हैं।
 राज्य के जनगणना विभाग के संयुक्त अधिकारी पीके मजुमदार का कहना है कि आधार बनाने के मामले में राज्य आठवें स्थान पर है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता है कि हम कार्ड बनाने के मामले में पिछड़े हुए हैं। पंचायत चुनाव और डाक घर में पिन कोड की समस्या को लेकर जरूर कार्ड बनाने में देरी हुई है, ऐसा नहीं होता तो हालात और अच्छे होते। पंचायत चुनाव के लिए मार्च के अंत में अधिसूचना जारी हुई थी और जुलाई तक प्रक्रिया पूरी हुई। इस दौरान ग्रामीण इलाकों में कार्ड बनाने का काम पूरी तरह से बंद रहा। इसके बाद एक नाम के कई जगह पिनकोड अपलोड होने के कारण शहरी इलाकों में आधार का काम थम गया था।
राज्य सरकार की ओर से कोलकाता, हावड़ा, हुगली, बांकुड़ा,कूचबिहार, दक्षिण दिनाजपुर और मालदा जिले के लिए 31 अक्तूबर तक आधार कार्ड बनाने का काम पूरा करने की समयसीमा तय कर दी है। जबकि वीरभूम, पूर्व मेदिनीपुर, पश्चिमी मेदिनीपुर, पुरुलिया, उत्तर दिनाजपुर और जलपाईगुड़ी जिले में 31 दिसंबर तक समयसीमा तय की गई है। बर्दवान,उत्तर चौबीस परगना, दक्षिण चौबीस परगना, मुर्शिदाबाद, नदिया और दार्जिलिंग जिले के लिए 28 फरवरी की समयसीमा तय की गई है।
इधर राज्य सरकार के सूत्रों का कहना है कि सिलेंडर की सबसिडी सीधे उपभोक्ताओं के खाते में पहुंचाने के लिए सभी लोगों को 28 फरवरी तक आधार के दायरे में लाने की परियोजना बनाई गई है। गृह सचिव बासुदेव बंदोपाध्याय के मुताबिक इस बारे में केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्रालय को पत्र लिख कर कहा जाएगा कि तय समय पर काम पूरा नहीं हुआ तब सबसिडी के मामले में समयसीमा बढ़ाई जाए, जिससे लोगों को किसी तरह की परेशानी नहीं हो। 

Wednesday, June 12, 2013

बंगाल में अपराध घटे या बढ़े?

 राज्य में महिलाओं के खिलाफ अपराध की घटनाओं में वृद्धि हुई है। नेशनल क्राईम रिकार्ड  ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट में इसका खुलासा किया गया है। लेकिन राज्य सरकार का कहना है कि बलात्कार और महिलाओं के खिलाफ संगीन अपराध की घटनाओं में कमी हुई है। रिपोर्ट में सरकारी पक्ष का जिक्र नहीं किया गया है।
 राज्य के पुलिस महानिदेशक नपराजित मुखर्जी ने बुधवार को एक पत्रकार सम्मेलन में कहा कि राज्य में बलात्कार की घटनाएं अऔर संगीन अपराध में मामलों में उल्लेखनीय कमी हुई है। लेकिन ब्यूरो ने हमारा पक्ष छापने से इंकार कर दिया। हमलोगों ने ब्यूरो को लिखा कि हमारा पक्ष प्रकाशित किया जाए, जिससे आंकड़ों के बारे में गलत धारणाएं नहीं हो। 
मालूम हो कि क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य में 2012 में अपराध के 30942 घटनाएं हुई हैं, जबकि 2011 में यह 29133 थी। डकैती की घटनाएं 236 के बजाए 279 दर्ज हुई।  हत्या के मामले 2109 से बढ़कर 2252, हालांकि रिपोर्ट में कहा गया है कि बलात्कार की घटनाएं इस दौरान 2363 से घटकर 2046 हो गई है। जबकि मुखर्जी ने दावा किया कि यहां के  हालात दूसरे राज्यों के बेहतर हैं। उनका कहना है कि हमलोग महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध को रोकने के लिए बहुत गंभीर हैं और बीते छह महीने में इस बारे में कई कदम उठाए गए हैं। 
मालदा, उत्तर दिनाजपुर और हल्दिया में बलात्कार और गंभीर अपराध की घटनाओं के मामले में उम्र कैद की सजा दिए जाने का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि इससे अपराध दर और उत्पीड़न की रोकथाम के बारे में बीते छह महीने के दौरान हमारी कोशिशों का पता चलता है। इस मौके पर उन्होंने कहा कि संगीन अपराध के मामले बीते साल के मुकाबले 2317 से घट कर 2012 में 1978 हो गए हैं। 
मालूम हो कि पुलिस महानिदेशक का बयान उत्तर चौबीस परगना जिले के बारासात में कालेज छात्रा से सामूहिक बलात्कार की घटना के पांच दिन बाद आया है, जब सारे राज्य में विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि बारासात में नया पुलिस थाना बनाने के बारे में विचार किया जा रहा है। इसके साथ ही सामूहिक बलात्कार के मामले में पहले की कठोर कदम उठाए गए हैं। हालांकि उन्होंने माना कि उत्तर चौबीस परगना जिले के बैरकपुर में तीन पत्रकारों पर हमला करने के मामले में मुख्य अभियुक्त शिबु यादव फरार है। 
मुख्य सचिव संजय मित्र ने बारासात सामूहिक बलात्कार और टीवी पत्रकारों पर हमले की घटनाओं को बीते दो-तीन दिनों में हुई  छिटपुट घटनाएं बताते हुए कहा कि पुलिस  एक्शन ले रही है। हमलोग चार्जशीट पेश करके अदालत से सख्त सजा दिए जाने की मांग करेंगे। उन्होंने कहा कि अपराध के मामले में राज्य सरकार किसी भी तरह की राहत बरतने के लिए तैयार नहीं है। 
  


Thursday, June 6, 2013

ममता अग्निपरीक्षा तो सफल हुई पर संकट टला नहीं


रंजीत लुधियानवी
कोलकाता, 6   जून । भाजपा और कांग्रेस के बगैर  हावड़ा लोकसभा उपचुनाव सीट पर चुनाव जीत कर मुख्यमंत्री ममता बनर्जी  एक अग्निपरीक्षा में सफल हो गई हैं । दल के वोट भी नहीं घटे हैं। लेकिन इसके बावजूद सत्ताधारी दल के लोगों के चेहरे पर सफलता मिलने पर  खुशी की झलक नहीं दिख रही है। जबकि तृणमूल कांग्रेस अकेले दम पर सफल ही नहीं रही है, अपने मतदाताओं को भी साथ रखने में कामयाब हुई है। इस दौरान बाहरी उम्मीदवार, अंदरुनी गुटबाजी, शारदा चिट फंड घोटाले  और कांग्रेस की ओर से तृणमूल कांग्रेस को पराजित करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाने का भी विरोधियों को फायदा नहीं मिला । इसका सबसे बड़ा कारण माकपा के वोट प्रतिशत में वृद्धि है। बीते दो साल में पहली बार वाममोर्चा किसी उपचुनाव में अपने वोट बढ़ाने में सफल रही है। चार फीसद से ज्यादा वोट बढ़ने के साथ ही दो विधानसभा केंद्रों पर भी लीड हासिल करने में सफल रही, जिससे तृणमूल समर्थक हैरान-परेशान हैं।
तृणमूल कांग्रेस का मानना है कि सप्तरथी षडयंत्र के खिलाफ अभिमन्यु की तरह ममता बनर्जी ने माकपा,कांग्रेस, भाजपा, तीन बांग्ला टीवी चैनलों, तीन बांग्ला दैनिक समाचार पत्रों और एक श्रेणी के बुद्धिजीवियों से संघर्ष किया, जिन्होंने सरकार से जो हासिल करने की उम्मीद की थी, वह सफल नहीं हुई। इसके बाद वे लोग विरोधी बन गए। इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस के वोट घटे नहीं बल्कि बढ़ गए हैं। आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस को 2006 के विधानसभा में 12.25 फीसद मत मिले थे। जबकि 2011 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस-तृणमूल कांग्रेस गठबंधन को 49.94 फीसद वोट मिले थे। इसमें कांग्रेस के वोट निकाल दिए जाएं तो तृणमूल के वोट 37.69 फीसद होते हैं जबकि 2013 के लोकसभा उपचुनाव में तृणमूल ने लगभग सात फीसद ज्यादा 44.68 फीसद मत प्राप्त किए हैं। इतना ही नहीं 2009 के लोकसभा की बात करें तब भी कांग्रेस-तृणमूल गठजोड़ को 48.04 और माकपा को 44.27 फीसद वोट मिले थे। इसमें कांग्रेस के वोट निकालने पर भी तृणमूल के वोट ज्यादा ही दिखते हैं। जबकि माकपा के वोट 44.27 फीसद से घट कर 41.85 फीसद रह गए हैं।
विधानसभा नतीजों में भी ज्यादा हेरफेर नहीं हुआ है। पिछले लोकसभा की तरह ही इस बार भी विधानसभा इलाकों का नतीजा 5-2 रहा है। हालांकि तब  माकपा ने तब बाली और उत्तर हावड़ा में बढ़त हासिल की थी जबकि इस बार दक्षिण हावड़ा और सांकराईल में बढ़त मिली है। इस तरह विधानसभा इलाकों की स्थित, वोट प्रतिशत बढ़ने के साथ ही तृणमूल ने प्रतिष्ठा की सीट पर जीत हासिल की है। लेकिन समस्या यह है कि वोट प्रतिशत बढ़ने के साथ ही जीत का फर्क बहुत ज्यादा घट गया है। इसमें एक बड़ा कारण कांग्रेस के वोट माने जा रहे हैं भले ही वह कहीं भी सफल नहीं हो सकी। इसके अलावा भाजपा के वोट वाले इलाके उत्तर हावड़ा, मध्य हावड़ा, पांचला में वोट बढ़े हैं। विधानसभा (2011) में माकपा सभी सात जगह पिछड़ रही थी लेकिन इस बार 37 फीसद से 41.85 फीसद वोट हासिल करने के साथ ही पांच विधानसभा केंद्रों में प्रतिशत बढ़ा जबकि एक जगह यथास्थिति रही है। विधायक अशोक घोष के उत्तर हावड़ा में जीत का फर्क 19608 से घट कर 6952, मंत्री अरुप राय के मध्य हावड़ा में 50670 से 6952, जटुलहिरी के शिवपुर में 46404 से 7047, ब्रजमोहन मजुमदार के दक्षिण हावड़ा में तो माकपा ने 31422 से पिछड़ने के बाद 2519 की बढ़त हासिल की। यही हाल सांकराईल का रहा, यहां माकपा ने शीतल सरदार की बढ़त 17859 को लांघ कर 6602 बढ़त प्राप्त की। पांचला में गुलशन मल्लिक भी 12118 को नहीं संभाल सके और यह महज 9960 रह गई।
राजनीतिक प्रेक्षकों का मानना है कि भले ही तृणमूल कांग्रेस के वोट 2006 और 2009 की तुलना में ज्यादा इधर-उधर नहीं हुए हैं। लेकिन उनके चार फीसद वोट माकपा की झोली में गए हैं और भाजपा के लगभग चार फीसद वोट तृणमूल को मिले हैं। इस तरह माकपा के वोट बढ़ गए लेकिन तृणमूल के वोट कुल मिलाकर पहले की तरह ही रहे हैं। सांकराईल और दक्षिण हावड़ा की हार तृणमूल के लिए खतरे की घंटी है क्योंकि दोनों विधानसभा केंद्र ग्रामीण इलाके में हैं और अगले महीने पहले चरण के पंचायत चुनाव यहां होने वाले हैं। दोनों इलाकों में 20 से 25 फीसद मुसलमान मतदाता भी हैं, चिट फंड घोटाले के पीड़ित लोगों की यहां भारी संख्या भी है। कांग्रेस का मानना है कि सांकराईल में उनके लगभग 32 हजार वोट हैं। तृणमूल कांग्रेस को 61737, माकपा को 68339 और कांग्रेस को यहां 20608 वोट मिले हैं। दक्षिण हावड़ा में तृणमूल कांग्रेस को 70049, माकपा को 72568 और कांग्रेस को 11013 वोट मिले हैं। हालांकि पांचला में भी कांग्रेस ने 17659 वोट हासिल करने में सफलता प्राप्त की लेकिन तृणमूल कांग्रेस 69612, माकपा को 59652 वोट मिले।
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने हावड़ा की जीत के बाद साफ तौर पर कहा है कि हमें कांग्रेस की नहीं उन्हें हमारी जरूरत है। लेकिन उपचुनाव के नतीजों से लगता है कि अकेले चुनाव लड़ने के कारण जहां कांग्रेस का सफाया हो सकता है वहीं वाममोर्चा को भारी सफलता मिलने की उम्मीद है। इसका खामियाजा सत्ताधारी दल को ही भुगतना होगा क्योंकि हावड़ा में 2008 के पंचायत चुनाव में वाममोर्चा को 62.16, तृणमूल कांग्रेस-कांग्रेस को 17.16 और भाजपा को 1.09 फीसद सफलता मिली थी।  भाजपा-कांग्रेस के बगैर पंचायत चुनाव की वैतरणी पार करना ममता के लिए आसान नहीं होगा।