Wednesday, July 18, 2012

हरी सब्जी से हो सकता है कैंसर

 सब्जी बाजार में कीमतें कम होने से लोगों ने राहत की सांस ली है लेकिन हमलोग जो साग-सब्जी खरीद रहे हैं वह सुरक्षित है? हम जिसे स्वास्थ्यवर्द्धक और अच्छी सब्जी मानते हैं , उसे खाने से कई घातक बीमारियां हो सकती हैं। इससे कैंसर तक हो सकता है। जिगर खराब हो सकता है।  सरकारी रिपोर्ट भी मानती है कि ग्राहकों को लुभाने के लिए महानगर में सब्जियों में जहरीला रसायन मिलाया जा रहा है। आलू, प्याज, परवल, मछली, सरसों का तेल, काली मिर्च, चाय, काफी, बूंदी और लड््डू जैसे आम लोगों के खाने वाली वस्तुओं में ऐसा रसायन मिलाया जा रहा है लोगों के स्वास्थ्य के लिए घातक हो सकता है। इतना ही नहीं हजारों लोगों की मनपसंद बिरियानी भी अब सुरक्षित नहीं रही है। नासमझी के कारण लोग  यह सारा खाना खाने को मजबूर हैं। कोलकाता नगर निगम के अधिकारियों को इसके खतरे का आभास है लेकिन ढांचागत सहूलतें और कुछ करने की आदत नहीं होने के कारण ऐसा करने वाले व्यापारियों पर अंकुशनहीं लगाया जा रहा है।
नगर निगम सूत्रों का कहना है कि खाद्य पदार्थ में मिलावट का पता लगानेके लिए 2010-2011 में कोलकाता के विभिन्न इलाकों से फूड एनाल्सिट विभाग की ओर से कुल मिलाकर 250 नमूने संग्रह किए गए थे। इनकी जांच करने के बाद पता चला कि कम से कम 50 पदार्थो में जहरीला रसायन मिलाया गया था। नमूना परीक्षा में देखा गया कि महानगर में बिकने वाले फास्ट फूड और कच्ची सब्जी के मामले में कई जगह खतरे की सीमा तक रसायन मिला है। इसका नतीजा पता चलने पर ज्यादातर लोग आतंकित हो जाएंगे।
गौरतलब है कि सब्जी बाजार में जाकर सभी लोग ताजा सब्जी की तलाश करते हैं। आम तौर पर माना जाता है कि ज्यादा हरी दिखने वाली सब्जी ही ताजा होती है। इसलिए बाजार में ज्यादा हरे रंग की सब्जियों की मांग ज्यादा रहती है। ऐसी सब्जी की कीमत भी आम तौर पर ज्यादा रहती है। नगर निगम के विशेषज्ञों का कहना है कि परवल, झींगा, साग समेत हरे रंग की सब्जियों में हरियालापन ज्यादा करने के लिए कापर सल्फेट या डायमंड ग्रीन रसायन का प्रयोग किया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि ऐसा रसायन लगातार पेट के भीतर जाने से लीवर खराब हो सकता है। इससे लीवर कैंसर तक हो सकता है। इससे अंतड़ियां भी खराब हो सकती हैं। यह रंग पानी में धोने से जल्दी साफ नहीं होता है। इसलिए डाक्टरों की सलाह मान कर हरी सब्जियां खाना खतरनाक भी हो सकता है।
इसी तरह लाल आलू को रंगीन करनेके लिए कंगोरेड व रोडामिन रसायन मिलाया जाता है। यह भी जिगर के लिए घातक है। इससे आंखे भी खराब हो सकती हैं। आम तौर पर माना जाता है कि काली मिर्च सेहत के लिए अच्छी होती है लेकिन ज्यादातर लोग इसे पसंद करते हैं। कीड़े मिर्च को नष्ट न कर दें, इसलिए कई व्यापारी किरासन तेल या इससे मिलता-जुलता रसायन डाल कर इसे रखते हैं। इससे खतरनाक कार्बन लोगों के भीतर प्रवेश करता है। सब्जीकी तरह की मछली खाना भी सुरक्षित नहीं है। माना जाता है कि मछली का कान का  हिस्सा जितना लाल होता है वह उतनी ही ताजा होती है।  इसके लिए मछली व्यापारी लाल रंग के रसायन का प्रयोग करते हैं। इसी तरह टमाटर में भी रंग का व्यवहार किया जाता है। दानादार, बूंदी और लड््डू में मेटानिल येलो या केसरी रंग का व्यवहार किया जाता है। कटलेट, वेजिटेबल चाप में भी केसरी रंग का व्यवहार होता है। इससे भी कैंसर हो सकता है। बिरियानी को रंगीन बनानेके लिए अरामिन टारटाजिन मिलाया जाता है। अरहर की दाल में भी रसायन मिलाया जाता है।
कोलकाता नगर निगम में विभागीय मेयर परिषद के सदस्य डाक्टर पार्थ हजारी का कहना है कि भोज्य पदार्थ में मिलावट का पता चलने पर अदालत में मामला दायर कियाजाता है। लेकिन ज्यादातर मामलों में निगम अदालत का फैसला खिलाफ होने पर अभियुक्त उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय में चले जाते हैं। वहां जाकर निगम उनका मुकाबला नहीं सकता। इसका प्रमुख कारण यह है कि हमारे पास मिलावट का पता लगाने के लिए आधुनिकतम प्रयोगशाला नहीं है।

Wednesday, July 11, 2012

घर बैठे 10 लाख वेतन लेने वाली नर्स काम पर लौटी

 बगैर दफ्तर गए किसी व्यक्ति को वेतन मिल सकता है, इसकी मिसाल राज्य के स्वास्थ्य विभाग में मिली है। आरोप है कि आरजीकर मेडिकल कालेज अस्पताल की एक स्टाफ नर्स छह साल तक अस्पताल गए बगैर लगातार वेतन लेती रही है। पता चला है कि छह साल में उसने 10 लाख रुपए से भी ज्यादा वेतन प्राप्त किया है। इस मामले का पता चलने से स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी हैरान हैं और कहा जा रहा है कि यह किसी एक व्यक्ति का दोष नहीं है, इसके पीछे कोई गिरोह सक्रिय है। स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी विश्वरंजन मुखर्जी ने मामले कीजांच का आदेश दिया है जिससेपता लगाया जा सके कि क्या यह इकलौती ऐसी घटना है या दूसरे सरकारी अस्पतालों में भी ऐसा ही किया जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक इस घटना का पता चलने पर आरजीकर अस्पताल के अधिकारियों की गलती का पर्दाफास होगा, इससे लगभग एक महीने तक इस बारे में चुप्पी धारण की गई। हाजरी खाते में हस्ताक्षर नहीं किए जाने के कारण अभियुक्त नर्स के लिए बचने की गुंजाईश नहीं थी। हालांकि इसके बाद भी अस्पताल प्रबंधन की ओर से अभियुक्त नर्स के साथ समझौते के प्रयास का आरोप लगाया गया है। बाद में नर्स ने लिखित तौर पर अपनी गलती मानी और पांच लाख रुपए की राशि वापस की। इसे सरकारी खजाने में जमा किया गया है। अस्पताल की ओर से इस मामले में जांच की जा रही है, इस बीच नर्स को सोमवार से काम पर आने की प्रबंधन ने मंजूरी प्रदान की है। हालांकि इसे लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं कि लिखित तौर पर अपना अपराध स्वीकार करने के बाद कैसे नर्स को काम पर नियुक्ति की मंजूरी दी गई। जबकि अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि गलती मान कर रकम लौटाने वाली नर्स को एक मौका दिया ही जा सकता है।
इधर मामले का पता चलने के बाद स्वास्थ्य विभाग ने घटना पर कड़ी प्रतिक्रिया प्रकट करते हुए आरजीकरअस्पताल प्रबंधन से पूछा है कि मामले की रिपोर्ट विभाग को क्यों नहीं दी गई। दोषी महिला को दंडित क्यों नहीं किया जा रहा है। अस्पताल के एकाउंट अधिकारी व बिलिंग सहायक को भी कारण बताओ नोटिस जारी किया गया है।

Sunday, July 8, 2012

कोल्ड स्टोर को लेकर भी ममता केंद्र में टकराव



 मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कें द्र सरकार की सिफारिश के मुताबिक कोल्ड स्टोर से पूरी तरह नियंत्रण हटाने और किराया बढ़ाने का प्रस्ताव ठुकरा दिया है। पश्चिम बंगाल इकलौता ऐसा राज्य है जहां राज्य सरकार कोल्ड स्टोर का किराया नियंत्रित करती है। केंद्र सरकार की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि कृषि के सामान से नियंत्रण हटा दिया जाए। बीते दिनों गुवाहाटी में हुई एक बैठक में भी यह बात की गई है। केंद्रीय मंत्री शरद पवार ने इस बारे में मुख्यमंत्री को पत्र भी लिखा है। केंद्र के मुताबिक कृषि के सामान पर किसी तरह का नियंत्रण नहीं रहना चाहिए। राज्य में छोटे और मझले कोल्डस्टोर स्थापित किए जाने चाहिए। इससे सामान की कालाबाजारी पर अंकुश लगेगा और एक राज्य का सामान दूसरे राज्य में आसानी से मिल सकेगा।
 पुराने कोल्ड स्टोर की मरम्मत और नए कोल्ड स्टोर के निर्माण के लिए केंद्र सरकार अनुदान भी दे रही है। नए कोल्ड स्टोर के लिए 40 फीसद और पुराने कोल्ड स्टोर की मरम्मत के लिए 20 फीसद रकम केंद्र सरकार की ओर से दी जाएगी।  केंद्र सरकार का अनुदान मिलने पर राज्य में 110 कोल्ड स्टोर स्थापित करने के प्रस्ताव मिले हैं।  राज्य में कुल मिलाकर 470 कोल्डस्टोर हैं। यहां आलू के मौसम में प्रति क्विंटल 100 रुपए किराया लिया जाता है।  उत्तर प्रदेश में 160 रुपए, बिहार में 200 रुपए किराया लिया जाता है। कृषि विपणन विभाग के मंत्री अरुप राय का कहना है कि   किराया बढ़ाने या नियंत्रण समाप्त करने के बजाए वैकल्पिक व्यवस्था के बारे में सोच विचार किया जा रहा है।

Thursday, July 5, 2012

अब कोलकाता में चलेगे रंग बिरंगे आटोरिक्शा


  राज्य सरकार ने अब आटोरिक्शा पर लगाम लगाने की ठान ली है।  इसके तहत कोलकाता व आसपास के इलाकों को छह इलाकों में बांटा जाएगा। इसके बाद सभी इलाकों का रंग अलग-अलग होगा जिससे एक इलाके का आटोरिक्शा दूसरे इलाके में न जा सके। इतना ही नहीं सभी जगह एक बराबर किराया रखा जाएगा। इसके तहत पहले पांच किलोमीटर तक न्यूनतम किराया पांच रुपए होगा। सभी आटो एलपीजी गैस से चलाए जाने का इंतजाम किया जा रहा है। यह भी तय किया गया है कि किसी नए रुट के लिए मंजूरी न दी जाए।
मालूम हो कि महानगर व आसपास के लोगों को आटोरिक्शा चालकों से भारी शिकायतें हैं। इसके बावजूद आटो चालकों की ओर से बीते कई दिनों से किराया वृद्धि के लिए आंदोलन किया जा रहा है। इसके बाद राज्य सरकार की ओर से दोनों पक्ष की शिकायतें सुनी गई। सभी इलाकों में एक नीति जारी करने के लिए कमेटी का गठन किया गया था। इसकी सिफारिश हाल में जमा हुई है जिसमें आटोरिक्शा चालकों को कानून के दायरे में लाया जा सके और अनुशासित किया जा सके।
सूत्रों ने बताया कि कमेटी की सिफारिश के मुताबिक सभी रुटों में एक ही किराया किया जाना चाहिए। पहले तीन किलोमीटर तक किराया पांच रुपए किया जाए। इसके बाद पांच किलोमीटर तक किराया सात रुपए, और सात किलोमीटर तक नौ रुपए किए जाने की सिफारिश की है। हालांकि सात किलोमीटर से ज्यादा रुट किसी भी हालत में नहीं होना चाहिए। मौजूदा पांच किलोमीटर तक के रास्ते के लिए आटोचालक 10-11 रुपए तक किराया वसूल करते हैं। यह भी सिफारिशकी गई है कि आटो को पूरे रूट पर चलना होगा, अगर बाली से डनलप तक आटो रुट है तो वह बाली से दक्षिणेश्वर तक नहीं चला सकता है।
राज्य सरकार ने आटोरिक्शा पर अंकुश लगाने के लिए आशिषरंजन ठाकुर के नेतृत्व में कमेटी का गठन किया गया था। उन्होंने सिफारिश की है कि अब आटो चलाने के लिए छह भागों में बांटने की सिफारिश की गई है। इसमें हर इलाके के लिए अलग-अलग रंग होने चाहिए। इसके तहत उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम कोलकाता को छोड़कर उत्तरी शहरी इलाका और दक्षिण शहरी इलाका निर्धारित किया गया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि एक रुट का आटो दूसरे रुट में न चल सके।
परिवहन विभाग के सूत्रों ने बताया कि किस इलाके में किसरंग का आटो चलेगा, यह प्रशासन की ओर से तय किया जाएगा। इसका जिक्र आटो के परमिट में भी किया जाएगा। जिससे रंग देख कर ही आटो की पहचान हो सके। आम तौर पर देखा गया है किआटो चालक का घर उसी इलाके में होता है, जहां वह आटो चलाता है इसलिए दूसरे इलाके में आटो लेकर जाने की ज्यादा जरुरत नहीं होती। इसके साथ ही इलाके के सभी पंप में एलपीजी गैस  की व्यवस्था हो, इसकी भी सिफारिश की गई है। इसके साथ ही कमेटी ने सिफारिश की है कि नए रुट और परमिट देना बंद किया जाए। आरोप है कि कोलकाता में दस हजार से ज्यादा आटोरिक्शा बगैर परमिट के चल रहे हैं। कमेटी ने ऐसे आटो को तुरंत नियमित करने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही यह भी कहा गया है कि सभी आटो गैस से नहीं चल रहे हैं, इसलिए यह प्रक्रिया भी जल्द से जल्द पूरीकी जाए। कोलकाता में आटोरिक्शा के 125 रुट हैं, लेकिन इन्हें राज्य सरकार ने मंजूरी प्रदान नहीं की है भले ही आंचलिक परिवहन अधिकारी (आरटीओ) से मान्यता मिली हुई है। ऐसे रुट को मंजूरी देने की सिफारिश भी की गई है। माना जा रहा है कि इससे आटो चालकों की मनमानी बंद होगी और कानून में शिकंजे में आने के बाद किराया व संचालन ठीक होने से लोगों को राहत मिल सकेगी।
मालूम हो कि राज्य सरकार ने पेट्रोल से गैस में परिवर्तित करने के लिए सभी आटो को हरे रंग का करने का निर्देश दिया था। लेकिन इसके बाद पेट्रोल से चलने वाले आटो चालकों ने भी रंग बदल लिया और प्रशासन को इसका पता ही नहीं चल सका। क्या इस बार भी वैसा ही होगा, इस बारे में परिवहन विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि यह देखना पुलिस का काम है। जबकि पुलिस वालों का कहना है कि पहले ही कर्मचारियों की संख्या कम है, इसके बाद नए काम देखना संभव नहीं है।

























अब कोलकाता में चलेगे रंग बिरंगे आटोरिक्शा

Friday, June 22, 2012

ममता ने घटिया दवा आपूर्ति करने वाली 50 संस्थाओं को सूची से निकाला


 सरकारी अस्पतालों में घटिया दवाओं की आपूर्ति करने वाली संस्थाओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं। राज्य के स्वास्थ्य विभाग की ओर से इस बारे में शिकायते मिलने के बाद यह फैसला किया गया है। इस तरह कुल मिलाकर 50 संस्थाओं के नाम सूची से काटे गए हैं। पहले दवा आपूर्ति करने वाली 250 संस्थाएं थी इनमें राज्य की 110 संस्थाओं के नाम थे।
सूत्रों के मुताबिक स्वास्थ्य विभाग की नई सूची में कुल मिलाकर 182 संस्थाओं को शामिल किया गया है। इसमें राज्य की 60 संस्थाएं शामिल हैं। पुरानी 45 फीसद दवा आपूर्ति करने वाली संस्थाओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं।स्वास्थ्य शिक्षा  अधिकारी सुशांत बनर्जी का कहना है कि हाल तक कुछ छोटी-छोटी संस्थाएं सस्ती दवाएं उपलब्ध करवाने का आश्वासन देकर सूची में अपना नाम दर्ज करवा लेती थी। कीमत कम रखने के लिए घटिया दवाइयों की आपूर्ति की जाती थी। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्देश दिया है कि दवाइयों की गुणवत्ता के मामले में किसी तरह का समझौता नहीं किया जाएगा, इसके बाद घटिया दवा आपूर्ति करने वाली संस्थाओं के नाम सूची से काट दिए गए हैं।

हाईकोर्ट का ममता को झटका, सिंगूर विधेयक खारिज


पश्चिम बंगाल के बहुचर्चित सिंगूर जमीन मामले में कोलकाता हाईकोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने सिंगूर भूमि पुनर्वास और विकास विधेयक को असंवैधानिक करार दिया है।
टाटा ने इस मामले में कलकत्ता हाईकोर्ट के ही एक सदस्यीय बेंच के उस फैसले को चुनौती दी थी, जिसने पिछले साल इस विधेयक को सही ठहराया था।
ममता बनर्जी ने पश्चिम बंगाल में मुख्यमंत्री का पद संभालने के बाद पिछले साल जून में ये विधेयक पारित किया था। इस विधेयक के तहत सिंगूर में टाटा के साथ हुए समझौते को रद्द करते हुए ज़मीन किसानों को वापस दी जानी थी।
कलकत्ता हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ ममता सरकार सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है। पश्चिम बंगाल में पिछली वाममोर्चा सरकार के कार्यकाल में टाटा समूह के साथ समझौता हुआ था, जिसके तहत टाटा को सिंगूर में अपना संयंत्र लगाना था और उसके लिए उसे भूमि आवंटित की गई थी।
पश्चिम बंगाल सरकार ने एक हज़ार एकड़ जमीन का अधिग्रहण करके उसे टाटा मोर्टस को सौंप था जहाँ वो टाटा नैनो बनाने वाली थी। सिंगूर में टाटा मोटर्स का काम जनवरी 2007 में शुरु हुआ था। लेकिन भूमि आबंटन को लेकर टाटा समूह को लोगों का ज़बरदस्त विरोध झेलना पड़ा था।
योजना का विरोध करने वालों का कहना था कि सिंगूर में चावल की बहुत अच्छी खेती होती है और वहाँ के किसानों को इस परियोजना की वजह से विस्थापित होना पड़ा है। इसे लेकर हिंसक प्रदर्शन भी हुए थे।
आख़िरकर 2008 में टाटा समूह ने सिंगूर स्थित अपने संयंत्र को पश्चिम बंगाल से हटाने का फ़ैसला किया था। ममता बनर्जी ने 2011 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में सिंगूर को एक बड़ा मुद्दा बनाया था।
कोर्ट ने यह फैसला टाटा मोटर्स के हक में दिया है। हालांकि इस मामले में पश्चिम बंगाल सरकार सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती है और इसके लिए सरकार को कोर्ट ने दो महीने का वक्त भी दिया है।
मामले की सुनवाई कर रही न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष और न्यायमूर्ति एम के चौधरी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि सिंगूर एक्ट असंवैधानिक है।
टाटा मोटर्स ने कलकत्ता हाईकोर्ट की एकल पीठ के फैसले को चुनौती दी थी जिसने इस अधिनियम को बरकरार रखा था। इस अधिनियम के तहत पश्चिम बंगाल सरकार ने सिंगूर में कंपनी को दी जमीन का अधिकार का वापस ले लिया था।
30

Sunday, June 10, 2012

बंगाल के इमाम सरकारी भत्ते के खिलाफ ?


 राज्य में पंचायत चुनाव से पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मुस्लिम वोट बैंक पर कब्जा करने के लिए इमामों को भत्ता देने का एलान किया था। लेकिन राज्य के ज्यादातर इमामों ने भत्ता लेने के लिए आवेदन नहीं किया है। कहा जा रहा है कि उन्होंने सरकारी पेशकश को ठुकरा दिया है। वक्फ बोर्ड के 30 हजार  इमामों को भत्ता देने का एलान किया गया था। लेकिन महज 16 हजार इमामों ने भत्ता लेने के लिए आवेदन किया है। आवेदन करने वालों में भी कई भत्ता नहीं ले रहे हैं। जिला स्तर में पर्याप्त प्रचार किए जाने के बावजूद आवेदन जमा नहीं हो रहे हैं। उम्मीद के मुताबिक हालात उलट होने के कारण अल्पसंख्यक विभाग कार्यालय भी चिंतित बताया जाता है। मालूम हो कि राज्य में इमामों की संख्या 30 हजार से भी ज्यादा है।
सूत्रों से पता चला है कि वक्फ बोर्ड के अधिकारियों की ओर से भत्ता नहीं लेने के कुल मिलाकर चार कारण बताए जा रहे हैं। इसका पहला कारण यह है कि शरीयत कानून के मुताबिक इमाम कभी भी वेतन लेने वाले कर्मचारी नहीं हो सकते। किसी के नौकर नहीं हो सकते। मुस्लिम समाज के कई लोगों का मानना है कि इमाम सरकारी भत्ता हासिल करेंगे तो वह वेतन की तरह ही माना जाएगा। बाद में उन्हें सरकारी नौकरों में ही शामिल माना जाएगा। दूसरे भत्ता लेने के लिए वक्फ बोर्ड मस्जिद का पंजीकरण करवाने के लिए कहा गया है। जबकि राज्य में ऐसी बहुत मस्जिदें हैं जिनका बोर्ड से पंजीकरण नहीं है। कई लोगों का मानना है कि इस तरह बोर्ड से पंजीकरण करवाने के बाद गांव की मस्जिदें बोर्ड की संपति हो सकती हैं। इसलिए यहां के इमाम सरकारी घोषणा को नजरअंदाज कर रहे हैं। तीसरे राज्य सरकार की ओर से इमामों को 2500 रुपए मासिक भत्ता देने का एलान किया गया है। जबकि आम तौर पर इमाम इससे ज्यादा कमा रहे हैं। सरकारी अनुदान प्राप्त करने के बाद मस्जिदोें से मिलने वाली रकम में कमी हो सकती है, ऐसी आशंका के कारण कई लोग नहीं चाहते कि सरकारी अनुदान हासिल किया जाए। सरकार की आशा को निराशा में बदलने का एक कारण कई मुस्लिम धर्म गुरूओं की ओर से अनुदान लेने का विरोध किया गया है। इसलिए कुछ लोग सरकारी अनुदान से दूर रहना चाहते हैं।
आखिर इमाम भत्ता क्यों नहीं ले रहे हैं, इसका कारण क्या है? इस बारे में सरकारी टास्क फोर्स के एक सदस्य व एक  इमाम का कहना है कि सरकारी घोषणा का गलत मतलब निकाला जा रहा है। यह वेतन नहीं है, सरकार की ओर से नजराना दिया जा रहा है। इसे ज्यादातर लोग समझ नहीं रहे हैं। इसके खिलाफ प्रचार किया जा रहा है। सरकार की ओर से साफ किया गया है कि जो इमाम भत्ता लेना चाहेंगे उन्हें ही दिया जाएगा जबरन तो किसी को दिया नहीं जाएगा। हालांकि कई जगह बीडीओ को भी लौटा दिया गया है। लेकिन यह कहा जा सकता है कि सरकारी भत्ता लेने से कोई सरकार का गुलाम नहीं बन जाएगा।
राज्य अल्पसंख्यक विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि यह कहना गलत है कि इमामों ने भत्ता ठुकरा दिया है। यह एक क्रमिक प्रक्रिया है, लोग इसमें शामिल हो रहे हैं और जल्द ही सभी इमाम सूची में शामिल हो जाएंगे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 14 अप्रैल से 31 मई तक वक्फ बोर्ड में 15 हजार 125 आवेदन जमा हुए हैं। इनमें 14 हजार 825 आवेदन मंजूर हो गए हैं। इसके लिए सरकारी खजाने से पांच करोड़ 80 लाख 69 हजार 525 रुपए की राशि आबंटित की गई है। हालांकि कहा जा रहा है कि इसमें से भी कई इमामों ने भत्ता नहीं लिया है। प्राथमिक तौर पर जलपाईगुड़ी, बर्दवान और नदिया जिले से इमामों की सूची यहां आने में देरी हुई थी। सारे लोगों को मिलाकर 16 हजार लोगों की सूची बनी है।
वक्फ बोर्ड के सूत्रों का कहना है कि कोलकाता की 631 मस्जिदों में सिर्फ 366 इमामों ने भत्ते के लिए आवेदन किया है। यह आंकड़े देख कर विभाग के अधिकारी हैरान हैं। यहां पूछा जा रहा है कि महानगर कोलकाता में ही इमामों ने भत्ता क्यों ठुकरा दिया है? इसी तरह राज्य में कुल मिलाकर 30 हजार मस्जिदों से महज 16 हजार आवेदन का क्या मतलब निकाला जा सकता है?