Thursday, December 8, 2011

ममता सरकार के निर्देश से पुलिस वाले परेशान

ममता सरकार के निर्देश से राज्य के पुलिस वाले पुलिस वाले परेशान हैं। पुलिस फायरिंग में मगराहाट में एक छात्रा समेत तो महिलाओं की मौत के बाद राज्य सरकार ने पुलिस पर अंकुश लगाने का फैसला किया है। इसके तहत पुलिस वाले बंदूक के बजाए लाठी लेकर चलेंगे और गोलियां चलाने की जरुरत हो तो रबड़ की गोलियां चलाएंगे।
गुस्साए लोगों को संभालने के लिए पुलिस वालों को कैसा व्यवहार करना चाहिए, इस बारे में पुलिस महानिदेशक(डीजी) का निर्देश सभी जिलों में पहुंच गया है। लेकिन स्टैंडर्ड आपरेटिव प्रोसीड्यूर (एसओपी) से समस्या घटने के बजाए बढ़ गई है। मालूम हो कि निर्देश में कहा गया है कि गुस्साए लोगों की समूह को पहले समझाएं बात नहीं बने तो लाठीचार्ज करें। इससे भी फायदा नहीं हो तो अश्रू गैस के गोले छोड़ने के बाद भी फायदा नहीं हो तो उच्चाधिकारियों से मंजूरी लेकर फायरिंग करें। लेकिन गोलियां प्लास्टिक या रबड़ की चलानी होगी। समस्या यह है कि किसी जगह बंदूक है तो गोली नहीं, गोली है तो बंदूक नहीं। कई जगह दोनों नहीं है। इसके साथ ही प्रशिक्षित पुलिस कर्मचारी भी नहीं है।
राज्य पुलिस के महानिदेशक नपराजित मुखर्जी का निर्देश खास तौर पर पुलिस वालों के लिए है। इसके तहत पुलिस वाले जन आक्रोश दबाने के लिए गोलियां तो चलाएं लेकिन इसमें किसीव्यक्ति की जान नहीं जाए, इस पर जोर दिया गया है। इसलिए निर्देश में कहा गया है कि कानून व्यवस्था संभालनी हो या बिजली की चोरी करने वालों के खिलाफ कुछ करना हो, पुलिस वाले रबड़ की गोलियां, प्लास्टिक की गोलियां अभियान के दौरान साथ रखें। हालांकि राज्य के ज्यादातर पुलिस थाने में काम करने वालों ने ऐसी गोलियों के बारे में कम ही सुना है। यह गोलियां किस बंदूक में डाल कर चलाईजाती हैं, इसका भी लोगों को कम ही पता है। इसलिए यह निर्देश कहां तक सफल होगा, कहा नहीं जा सकता है।
सूत्रों से पता चला है कि पुलिस थाने दो दूर की बात है कई जगह जिला पुलिस मुख्यालय में भी रबड़ या प्लास्टिक की गोलियों का इंतजाम नहीं है। मालूम हो कि रबड़ की गोलियां अश्रु गैस के गोले छोड़ने वाली बंदूक गैस गन से चलाई जाती हैं। जबकि प्लास्टिक की गोलियां 303 राईफल से चलती हैं। कई थाना कर्मचारियों का कहना है कि बंदूक तो है लेकिन गोलियां नहीं हैं। जबकि प्लास्टिक प्लेट चलाने वाली बंदूक तो ज्यादातर पुलिस वालों ने शायद ही कभी देखी हो।
पुलिस सूत्रों का कहना है कि मुर्शिदाबाद जिले के शमशेरगंज, हरिहरपाड़ा और भगवानगोला में कुल मिलाकर एक-एक गैस गन और रबड़ की पांच-पांच गोलियां हैं। पूर्व मेदिनीपुर जिले के नंदीग्राम और खेजुरी थाने में रबड़ की गोलियां मौजूद हैं लेकिन जिले के दूसरे थानों में गोलियां नहीं दी गई हैं। वीरभूम जिला पुलिस के पास गिनी चुनी बंदूके और गोलियां हैं। हावड़ा जिले के ग्रामीण इलाके में ग्यारह पुलिस थानों में डोमजूड़, बागनान और उलबेड़िया में ही एक-एकगैस गन हैं जबकि दूसरे सभी आठ थानों में दो गैस गन ही हैंं। उत्तर बंगाल के ज्यादातर थानों में रबड़ की गोलियां नहीं हैं। जहां 25-50 गोलियां हैं वहां इसे चलानेके लिए प्रशिक्षित कर्मचारी नहीं हैं। जिले में कुल मिलाकर 100 से भी कम गोलियां हैं। इसलिए कई जगह कानून तोड़ो अभियान चलने पर पुलिस के लिए भारी मुश्किल होगी।
हालांकि इस बीच पुलिस महानिदेशक के निर्देश के बाद आटोमैटिक हथियार पुलिस कंट्रोल रुम में जमा करवाए जा रहे हैं। कांस्टेबलों को राइफल के बजाए लाठी थमा कर ड्यूटी पर भेजा जा रहा है। इतना ही नहीं दक्षिण बंगाल के एक जिले के पुलिस अधिकारी का कहना है कि बैंक से रुपए लाने के लिए जाने वाले पुलिस कर्मचारी भी बंदूक के बजाए लाठी लेकर जा रहे हैं।
एक पुलिस अधिकारी का कहना है कि आग्नेयास्त्र का व्यवहार कम से कम किया जाए। लेकिन पुलिस वाले गुस्साए लोगों के सामने खाली हाथ जाएंगे तो मार खाकर लौटना पड़ेगा। पुलिस वाले बंदूक हाथ में लेकर गोलियां ही नहीं चलाते कानून-व्यवस्था कायम रखने के लिए लोगों को डराना भी आवश्यक है।

Wednesday, December 7, 2011

बस में बेटिकट सफर करने वालों को देना होगा जुर्माना

रेलवे की तरह सरकारी बस में बेटिकट सफर करने वाले यात्रियों को अब जुर्माना देना होगा। मां,माटी, मानुष की नई राज्य सरकार इस नियम को सख्ती से लागू करने जा रही है। हावड़ा से धर्मतला के बीच चलने वाली रूट नंबर 24 बस को चलाने में एक किलोमीटर कुल मिलाकर 26 रुपए से ज्यादा का खर्च होता है। जबकि आय महज 19 रुपए होती है। ऐसा नहीं है कि कलक त्ता ट्रांसपोर्ट परिवहन निगम (सीएसटीस) के बस रूट घाटे में चलते हैं। हावड़ा से सियालदह के बीच रुट नंबर ग्यारह का खर्च 20 रुपए से ज्यादा है तो आमदन 34 रुपए से ज्यादा है। हावड़ा व यादवपुर के बीच चलने वाले ईचार नंबर रूट का खर्च 25 रुपए से कुछ ज्यादा तो आय 43 रुपए से ज्यादा है। इसी तरह हावड़ा-पर्णश्री रूट में चलने वाली एस 37ए का खर्च 30 रुपए तो आय 36 रुपए से ज्यादा है। इसमें पैसे कुछ इधर-उधर हैं । लेकिन यह सही तस्वीर नहीं है।
सरकारी आंकड़ों से पता चलता है कि सीएसटीसी के 65 रुट में 48 रुट घाटे पर चलते हैं। इनमें 31 रुट ऐसे हैं कि खर्च की तुलना में आय सामान्य ज्यादा है। लेकिन लाbhजनक रुट महज ग्यारह ही हैं। छह रुट ऐसे हैं जहां न फायदा न नुकसान हो रहा है। बाघबाजार -गरिया के बीच रुट नंबर 21 चलानेके लिए राज्य सरकार को प्रति किलोमीटर 26 रुपए 28 पैसे खर्च करने पड़ते हैं जबकि वापस सिर्फ 16 रुपए 75 पैसे ही आते हैं। जबकि विमानबंदर-गरिया के एक रूट में 30 रुपए खर्च के बदले महज 15 रुपए चार पैसे ही मिलते हैं।
सूत्रों से पता चला है कि कुल मिलाकर प्रतिदिन सीएसटीसी की 450 बसें चलती हैं इनमें महानगर और आसपास के रुट में 360 बसें चलती हैं। इनमें इतना खर्च हो रहा है कि राज्य परिवहन वि•ााग सकते में है। मालूम हो कि लग•ाग 13 करोड़ रुपए तो कर्मचारियों को वेतन देनेके लिए निकल जाते हैं। साढ़े तीन करोड़ रुपए डीजल खरीदने में खर्च होते हैं। जबकि टिकट बिक्री से लग•ाग पांच करोड़ रुपए की आमदनी होती है। सूत्रों का कहना है कि किसी बस के खराब होने पर उसकी मरम्मत करवाना एक समस्या हो जाता है।
सीएसटीसी के अध्यक्ष maante हैं कि बस रुट में घाटा हो रहा है। लेकिन उनका कहना है कि एक बार में ऐसे रुट से बसें बंद करना संbhव नहीं है क्योंकि सरकार की लोगों के प्रति जिम्मेवारी है। हालांकि उनका कहना है कि घाटे वाले रुट की बसे कुछ कम करने फायदे वाले रुट में चलाने की योजना जरुर है। सूत्रों से पता चला है कि निगम घाटे से उबरने के लिए कई प्रयास कर रहाहै। इसके तहत सबसे ज्यादा जोर टिकट बेच कर आय बढ़ाने पर दिया जा रहा है। इसके तहत बस स्टैंड से बस चलने से पहले ही यात्रियों से टिकट लेने पर सहमति प्रकट की गई है। जिससे चलती बस में टिकट काटने की ज्यादा समस्या नहीं हो।
इसके अलावा बस स्टाप पर बस से उतरने वाले यात्रियों से टिकट मांगने के लिए पर्यवेक्षकों को और ज्यादा सक्रिय किया जाएगा। हावड़ा बस स्टैंड पर ऐसी व्यवस्था है लेकिन कितने बेटिकट लोगों को पकड़ा गया होगा, इसका हिसाब नहीं है। सीएसटीसी की ओर से अब रेलवेकी तरह ही बेटिकट यात्रियों से जुर्माना वसूलने का काम शुरू किया जाएगा। एक अधिकारी के मुताबिक हाल तक जुर्माना वसूलनेकी व्यवस्था होने के बावजूद ऐसा नहीं किया जाता था। लेकिन अब जुर्माना वसूल किया जाएगा। मालूम हो कि जहां कुछ कंडक्टर बस यात्री से तय किराए से कम पैसे लेकर टिकट नहीं देते तो कुछ कंडक्टर पचास-सौ रुपए का खुदरा देने से बचने के लिए टिकट ही नहीं काटते। इससे निगम को घाटा होता है लेकिन कंडक्टर की सेहत पर असर नहीं पड़ता, जबकि प्राइवेट बस कंडक्टर चार रुपए के टिकट के लिए एक सौ रुपए का खुदरा आसानी से कर देता है।
इसके साथ ही ओवरटाइम और इंसेटिव पर अंकुश लगाने पर विचार किया जा रहा है। इन दोनो खातों में हर महीने निगम को 65 लाख रुपए खर्च करने पड़ते हं। इसे आगामी कुछ महीनों में 40 लाख रुपए कम करके 25 लाख करने की योजना है। इसके लिए बस रुट में परिवर्तन किया जाएगा, जिससे कोलकाता-दीघा जैसे रुट में कर्मचारियों से आठ घंटे से कम काम लिया जा सके और ओवरटाइम नहीं देना पड़े। इसके साथ ही कई रुटों पर तय मात्रा से ज्यादा टिकटों की बिक्री पर दिए जाने वाले इंसेंटिव पर कांट-छांट किए जाने की योजना है।

शराब बेच कर कमाई की योजना नाकाम

तृणमूल कांग्रेस सरकार की ओर से शराब की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि करके राजस्व वसूली का रिकार्ड कायम करने की योजना बनाई थी जिससे विधायकों और मंत्रियों की वेतन वृद्धि आसानी से की जा सके। हालांकि ऐसा लगता नहीं है कि इससे सरकार को कोई खास फायदा होने वाला है। इसके साथ ही दूध की कीमतों में भी भारी वृद्धि की गई है। शराब की बिक्री घटने के साथ ही सरकारी दूध की बिक्री भी पहले की तुलना में बढ़ नहीं रही है। इससे सरकारी योजना अधर में दिख रही है।
गौरतलब है कि राज्य में सबसे ज्यादा देशी-विदेशी शराब की बिक्री दुर्गापूजा के महीने में होती है। बीते साल अक्तूबर महीने में देशी शराब की 67 लाख पांच हजार लीटर शराब की बिक्री हुई थी। जबकि अक्तूबर 2011 में बिक्री बढ़ने के बजाए 0.7 फीसद घट गई है। इस साल 66 लाख 55 हजार लीटर देशी शराब ही बिक सकी। आबकारी विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि विदेशी शराब बीते साल पूजा के महीने में 87 लाख 70 हजार लीटर बिकी थी, लेकिन इस साल महज 72 लाख छह हजार लीटर शराब ही बिक सकी है। इस तरह 17.8 फीसद बिक्री घट गई है। हालांकि कीमतों में भारी वृद्धि के कारण राजस्व 155 करोड़ 25 लाख रुपए से बढ़कर 162 करोड़ 54 लाख रुपए हुआ है। यह वृद्धि 4.7 फीसद है जबकि सरकार की ओर से 32 फीसद आय बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। नवंबर महीने में तो बिक्री की हालत और भी खराब रही है। माना जा रहा है कि इससे राजस्व में घाटा होगा, जिससे सरकारी लक्ष्य हासिल करना टेढ़ी खीर हो सकता है।
सूत्रों से पता चला है कि छह महीने पुरानी सरकार खर्चो से परेशान है इसलिए राजस्व बढ़ाने के मद्देनजर पूजा से पहले राज्य सरकार ने कीमतें बढ़ाने का एलान किया था। बीते कुछ महीने के दौरान 750 मिली लीटर की बोतल पर लगभग एक सौ रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है। इससे राजस्व की कमी महानगर कोलकाता ही नहीं दूसरे जिलों में भी दर्ज की गई है। आबकारी विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक अक्तूबर महीने में जलपाईगुड़ी में विदेशी शराब की बिक्री 1.4 फीसद बढ़ी। इससे लोगों ने विदेशी शराब पीना छोड़ कर देशी शराब पीना शुरू कर दिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हुगली में 22.7 फीसद, हावड़ा में 39 फीसद, नदिया में 71 फीसद, पूर्व मेदिनीपुर में 80.8 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले में 29.1 फीसद देशी शराब की बिक्री बढ़ी है।
हालांकि आबकारी विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि सरकार कीमतों में वृद्धि करके राजस्व बढ़ाने के बजाय लोगों को शराब से दूर करना चाहती है। सरकार की नीति का नतीजा देखा जा रहा कि शराब की बिक्री घट रही है। लेकिन दूध की कीमतें बढ़ाने के पीछे क्या उद््देश्य है, इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं। लेकिन सरकार इस मोर्चे में भी नाकाम रही है, इसका पता इससे चलता है कि महंगी शराब की बिक्री घटने के साथ ही देशी और अवैध शराब (चुल्लू) की बिक्री में भारी वृद्धि देखी गई है। पूर्व मेदिनीपुर जिले में लगभग 81 फीसद देशी शराब की बिक्री बढ़ने से यह बात पता चलती है कि अवैध शराब का प्रचलन बढ़ने से कभी भी कोई बढ़ा हादसा हो सकता है।

शराब बेच कर कमाई की योजना नाकाम

तृणमूल कांग्रेस सरकार की ओर से शराब की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि करके राजस्व वसूली का रिकार्ड कायम करने की योजना बनाई थी जिससे विधायकों और मंत्रियों की वेतन वृद्धि आसानी से की जा सके। हालांकि ऐसा लगता नहीं है कि इससे सरकार को कोई खास फायदा होने वाला है। इसके साथ ही दूध की कीमतों में भी भारी वृद्धि की गई है। शराब की बिक्री घटने के साथ ही सरकारी दूध की बिक्री भी पहले की तुलना में बढ़ नहीं रही है। इससे सरकारी योजना अधर में दिख रही है।
गौरतलब है कि राज्य में सबसे ज्यादा देशी-विदेशी शराब की बिक्री दुर्गापूजा के महीने में होती है। बीते साल अक्तूबर महीने में देशी शराब की 67 लाख पांच हजार लीटर शराब की बिक्री हुई थी। जबकि अक्तूबर 2011 में बिक्री बढ़ने के बजाए 0.7 फीसद घट गई है। इस साल 66 लाख 55 हजार लीटर देशी शराब ही बिक सकी। आबकारी विभाग के आंकड़ों से पता चलता है कि विदेशी शराब बीते साल पूजा के महीने में 87 लाख 70 हजार लीटर बिकी थी, लेकिन इस साल महज 72 लाख छह हजार लीटर शराब ही बिक सकी है। इस तरह 17.8 फीसद बिक्री घट गई है। हालांकि कीमतों में भारी वृद्धि के कारण राजस्व 155 करोड़ 25 लाख रुपए से बढ़कर 162 करोड़ 54 लाख रुपए हुआ है। यह वृद्धि 4.7 फीसद है जबकि सरकार की ओर से 32 फीसद आय बढ़ाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था। नवंबर महीने में तो बिक्री की हालत और भी खराब रही है। माना जा रहा है कि इससे राजस्व में घाटा होगा, जिससे सरकारी लक्ष्य हासिल करना टेढ़ी खीर हो सकता है।
सूत्रों से पता चला है कि छह महीने पुरानी सरकार खर्चो से परेशान है इसलिए राजस्व बढ़ाने के मद्देनजर पूजा से पहले राज्य सरकार ने कीमतें बढ़ाने का एलान किया था। बीते कुछ महीने के दौरान 750 मिली लीटर की बोतल पर लगभग एक सौ रुपए की बढ़ोत्तरी हुई है। इससे राजस्व की कमी महानगर कोलकाता ही नहीं दूसरे जिलों में भी दर्ज की गई है। आबकारी विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक अक्तूबर महीने में जलपाईगुड़ी में विदेशी शराब की बिक्री 1.4 फीसद बढ़ी। इससे लोगों ने विदेशी शराब पीना छोड़ कर देशी शराब पीना शुरू कर दिया है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक हुगली में 22.7 फीसद, हावड़ा में 39 फीसद, नदिया में 71 फीसद, पूर्व मेदिनीपुर में 80.8 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले में 29.1 फीसद देशी शराब की बिक्री बढ़ी है।
हालांकि आबकारी विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि सरकार कीमतों में वृद्धि करके राजस्व बढ़ाने के बजाय लोगों को शराब से दूर करना चाहती है। सरकार की नीति का नतीजा देखा जा रहा कि शराब की बिक्री घट रही है। लेकिन दूध की कीमतें बढ़ाने के पीछे क्या उद््देश्य है, इस बारे में उन्हें कुछ पता नहीं। लेकिन सरकार इस मोर्चे में भी नाकाम रही है, इसका पता इससे चलता है कि महंगी शराब की बिक्री घटने के साथ ही देशी और अवैध शराब (चुल्लू) की बिक्री में भारी वृद्धि देखी गई है। पूर्व मेदिनीपुर जिले में लगभग 81 फीसद देशी शराब की बिक्री बढ़ने से यह बात पता चलती है कि अवैध शराब का प्रचलन बढ़ने से कभी भी कोई बढ़ा हादसा हो सकता है।

Monday, December 5, 2011

मजबूरी में भी लोग करते हैं बिजली चोरी

सबसे पहले तो बिजली का कनेक्शन लेना ही आसान नहीं है, उसके बाद अनियंत्रित तरीके से बगैर किसी मुकाबले के राज्य में बिजली दरों में लगातार वृद्धि होती जा रही है। भले ही केंद्र की ओर से सभी घरों में बिजली पहुंचाने की बात सालों पहले की गई थी लेकिन आज भी पचास फीसद लोगों को बिजली नहीं मिल सकी है। इसलिए कहीं लोग मजबूरी में बिजली की चोरी कर रहे हैं तो कहीं राजनीतिक दलों की मदद से यह काम किया जा रहा है। हुकिंग करके कितने ही घरों में ब त्ती, पंखे और टीवी चल रहे हैं ।
मकान के 100 गज के दायरे में बिजली का खंबा है, मकान के पक्के बरामदे से छूकर अल्यूमिनीयम की तार गुजरती दिखाईदेती है लेकिन इसके बावजूद घर में लालटेन जलाकर बच्चे पढ़ रहे हैं। हालांकि बिजली विभाग के कार्यालय में पर्याप्त रकम भी जमा की गई है। लेकिन उपभोक्ता का आवेदन सालों से फाइलों में दबा पड़ा है। बिजली विभाग की ओर से खंबे से लेकर घर तक बिजली पहुचाने में आनाकानी की मिसाले कोलकाता से कुछ दूरी पर मौजूद मगराहाट से लेकर जलपाईगुड़ी के मदारीहाट तक देखी जासकती हैं।
केंद्र सरकार की ओर से राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतपरियोजना शुरू की गई थी, इसके मुताबिक न्यूनतम 50 परिवारों या 100 लोगों के वर्जिन मौजा में सभी लोगों को बिजली देने का इंतजाम किया जाएगा। गरीबी सीमारेखा से नीचे (बीपीएल) के लोगों को मुफ्त और दूसरे लोगों को रुपए देकर बिजली मिलेगी। राज्य के 14 जिलों में यह काम वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कार्पोरेशन की ओर से किया जा रहा है। कोलकाता के अलावा दूसरे जिलों में केंद्र सरकार के तहत चार संस्थाएं यह काम कर रही हैं। एक दशक पहले शुरू हुई परियोजना के दौरान दो हजार करोड़ रुपए की रकम खर्च हो गई है। लेकिन अभी तक राज्य के आधे लोग बिजली की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मगराहाट के नैनान गांव के लोगों ने 2007 में बिजली के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक बिजली नहीं मिली है, इसलिए वहां लोग बिजली चोरी करने के लिए मजबूर थे।
आंकड़ों की बात करें तो सरकार खुद यह बात मानती है कि राज्य के आधे से ज्यादा 55 फीसदी लोगों के घरों में बिजली नहीं पहुंच सकी है। जबकि पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के चार राज्यों में लगभग 100 फीसद बिजली पहुंच चुकी है। बिजली विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक कूचबिहार के 70 फीसद, उ त्तर दिनाजपुर के 70 फीसद, मालदा जिले के 64 फीसद, पुरुलिया के 65 फीसद, मुर्शिदाबाद जिलेके 60 फीसद, जलपाईगुड़ी के 62 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले के 55 फीसद, वीरभूम के 53 फीसद, बांकुड़ा के 52 फीसद, पूर्व औरपश्चिमी मेदिनीपुर जिले के 51 फीसद, बर्दवान के 47 फीसद, नदिया के 44 फीसद, उ त्तर चौबीस परगना जिले के 38 फीसद, दार्जिलिंग के 23 फीसद, हुगली के 24 फीसद और हावड़ा जिले के 10 फीसद परिवारों के घर में अभी तक बिजली नहीं पहुंच सकी है। उनका कहना है कि राज्य में ग्रामीण परिवार एक करोड़ 20 लाख है, इसमें 67 लाख परिवारों के घरों में बिजली पहुंच चुकी है।
राज्य के बिजली मंत्री ने विधानसभा में एलान किया था कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतपरियोजना के तहत 2041 करोड़ 76 लाख रुपए खर्च किए गए हैं और 3933 मौजा में से 3929 मौजा में बिजली पहुंचाने काकाम पूरा हो गया है। हालांकि केंद्रीय सरकार की परियोजना के मुताबिक एक मौजा में 10 फीसद घरों में बिजली कनेक्शन पहुंचने से ही वह इलाका बिजली वितरण का काम पूरा करने में सफल माना जाएगा। इस तरह सरकारी खाते में एक सौ फीसद लोगों को बिजली मिलने का रिकार्ड दर्ज होजाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि महज 10 फीसद लोगों के घरों में बिजली पहुंचने के बाद भी 90 फीसद परिवार अंधेरे में रहते हैं। बिजली विभाग के एक अधिकारी मानते हैं कि राज्य के ग्रामीण इलाकों की हालत ऐसी है कि लोग महीने में 50 रुपएका बिल भारने में भी असमर्थ हैं, ऐसे में बिजली की लाइन लेने से पहले उन्हें सौ बार सोचना पड़ता है।
ऐसे हालत में लोग बिजलीकी चोरी करते हैं। महानगर कोलकाता में भी बिजलीकी चोरी जारी है। इलाके के राजनीतिक दलों और दादाओं की मदद से यहकाम हो रहा है। शहर के 18 फीसद इलाके में चोरी ज्यादा हो रही है। इसमें मेटियाबुर्ज, गार्डेनरीच, तिलजला, नारकुलडांगा, रिपन स्ट्रीट, मेंहदीबगान, इलियट रोड, तपसिया, टेंगरा, लेक गार्डेन, उ त्तर पंचान्न ग्राम, बेहाला के कई इलाके शामिल बताए जाते हैं। सीईएससी के तहत टीटागढ़, हावड़ा, बानतला, कमरहट््टी के वि•िासबसे पहले तो बिजली का कनेक्शन लेना ही आसान नहीं है, उसके बाद अनियंत्रित तरीके से बगैर किसी मुकाबले के राज्य में बिजली दरों में लगातार वृद्धि होती जा रही है। भले ही केंद्र की ओर से सभी घरों में बिजली पहुंचाने की बात सालों पहले की गई थी लेकिन आज भी पचास फीसद लोगों को बिजली नहीं मिल सकी है। इसलिए कहीं लोग मजबूरी में बिजली की चोरी कर रहे हैं तो कहीं राजनीतिक दलों की मदद से यह काम किया जा रहा है। हुकिंग करके कितने ही घरों में ब त्ती, पंखे और टीवी चल रहे हैं ।
मकान के 100 गज के दायरे में बिजली का खंबा है, मकान के पक्के बरामदे से छूकर अल्यूमिनीयम की तार गुजरती दिखाईदेती है लेकिन इसके बावजूद घर में लालटेन जलाकर बच्चे पढ़ रहे हैं। हालांकि बिजली विभाग के कार्यालय में पर्याप्त रकम भी जमा की गई है। लेकिन उपभोक्ता का आवेदन सालों से फाइलों में दबा पड़ा है। बिजली विभाग की ओर से खंबे से लेकर घर तक बिजली पहुचाने में आनाकानी की मिसाले कोलकाता से कुछ दूरी पर मौजूद मगराहाट से लेकर जलपाईगुड़ी के मदारीहाट तक देखी जासकती हैं।
केंद्र सरकार की ओर से राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतपरियोजना शुरू की गई थी, इसके मुताबिक न्यूनतम 50 परिवारों या 100 लोगों के वर्जिन मौजा में सभी लोगों को बिजली देने का इंतजाम किया जाएगा। गरीबी सीमारेखा से नीचे (बीपीएल) के लोगों को मुफ्त और दूसरे लोगों को रुपए देकर बिजली मिलेगी। राज्य के 14 जिलों में यह काम वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कार्पोरेशन की ओर से किया जा रहा है। कोलकाता के अलावा दूसरे जिलों में केंद्र सरकार के तहत चार संस्थाएं यह काम कर रही हैं। एक दशक पहले शुरू हुई परियोजना के दौरान दो हजार करोड़ रुपए की रकम खर्च हो गई है। लेकिन अभी तक राज्य के आधे लोग बिजली की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मगराहाट के नैनान गांव के लोगों ने 2007 में बिजली के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक बिजली नहीं मिली है, इसलिए वहां लोग बिजली चोरी करने के लिए मजबूर थे।
आंकड़ों की बात करें तो सरकार खुद यह बात मानती है कि राज्य के आधे से ज्यादा 55 फीसदी लोगों के घरों में बिजली नहीं पहुंच सकी है। जबकि पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के चार राज्यों में लगभग 100 फीसद बिजली पहुंच चुकी है। बिजली विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक कूचबिहार के 70 फीसद, उ त्तर दिनाजपुर के 70 फीसद, मालदा जिले के 64 फीसद, पुरुलिया के 65 फीसद, मुर्शिदाबाद जिलेके 60 फीसद, जलपाईगुड़ी के 62 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले के 55 फीसद, वीरभूम के 53 फीसद, बांकुड़ा के 52 फीसद, पूर्व औरपश्चिमी मेदिनीपुर जिले के 51 फीसद, बर्दवान के 47 फीसद, नदिया के 44 फीसद, उ त्तर चौबीस परगना जिले के 38 फीसद, दार्जिलिंग के 23 फीसद, हुगली के 24 फीसद और हावड़ा जिले के 10 फीसद परिवारों के घर में अभी तक बिजली नहीं पहुंच सकी है। उनका कहना है कि राज्य में ग्रामीण परिवार एक करोड़ 20 लाख है, इसमें 67 लाख परिवारों के घरों में बिजली पहुंच चुकी है।
राज्य के बिजली मंत्री ने विधानसभा में एलान किया था कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतपरियोजना के तहत 2041 करोड़ 76 लाख रुपए खर्च किए गए हैं और 3933 मौजा में से 3929 मौजा में बिजली पहुंचाने काकाम पूरा हो गया है। हालांकि केंद्रीय सरकार की परियोजना के मुताबिक एक मौजा में 10 फीसद घरों में बिजली कनेक्शन पहुंचने से ही वह इलाका बिजली वितरण का काम पूरा करने में सफल माना जाएगा। इस तरह सरकारी खाते में एक सौ फीसद लोगों को बिजली मिलने का रिकार्ड दर्ज होजाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि महज 10 फीसद लोगों के घरों में बिजली पहुंचने के बाद भी 90 फीसद परिवार अंधेरे में रहते हैं। बिजली विभाग के एक अधिकारी मानते हैं कि राज्य के ग्रामीण इलाकों की हालत ऐसी है कि लोग महीने में 50 रुपएका बिल भारने में भी असमर्थ हैं, ऐसे में बिजली की लाइन लेने से पहले उन्हें सौ बार सोचना पड़ता है।
ऐसे हालत में लोग बिजलीकी चोरी करते हैं। महानगर कोलकाता में भी बिजलीकी चोरी जारी है। इलाके के राजनीतिक दलों और दादाओं की मदद से यहकाम हो रहा है। शहर के 18 फीसद इलाके में चोरी ज्यादा हो रही है। इसमें मेटियाबुर्ज, गार्डेनरीच, तिलजला, नारकुलडांगा, रिपन स्ट्रीट, मेंहदीबगान, इलियट रोड, तपसिया, टेंगरा, लेक गार्डेन, उ त्तर पंचान्न ग्राम, बेहाला के कई इलाके शामिल बताए जाते हैं। सीईएससी के तहत टीटागढ़, हावड़ा, बानतला, कमरहट्टी के विसबसे पहले तो बिजली का कनेक्शन लेना ही आसान नहीं है, उसके बाद अनियंत्रित तरीके से बगैर किसी मुकाबले के राज्य में बिजली दरों में लगातार वृद्धि होती जा रही है। भले ही केंद्र की ओर से सभी घरों में बिजली पहुंचाने की बात सालों पहले की गई थी लेकिन आज भी पचास फीसद लोगों को बिजली नहीं मिल सकी है। इसलिए कहीं लोग मजबूरी में बिजली की चोरी कर रहे हैं तो कहीं राजनीतिक दलों की मदद से यह काम किया जा रहा है। हुकिंग करके कितने ही घरों में ब त्ती, पंखे और टीवी चल रहे हैं ।
मकान के 100 गज के दायरे में बिजली का खंबा है, मकान के पक्के बरामदे से छूकर अल्यूमिनीयम की तार गुजरती दिखाईदेती है लेकिन इसके बावजूद घर में लालटेन जलाकर बच्चे पढ़ रहे हैं। हालांकि बिजली विभाग के कार्यालय में पर्याप्त रकम भी जमा की गई है। लेकिन उपभोक्ता का आवेदन सालों से फाइलों में दबा पड़ा है। बिजली विभाग की ओर से खंबे से लेकर घर तक बिजली पहुचाने में आनाकानी की मिसाले कोलकाता से कुछ दूरी पर मौजूद मगराहाट से लेकर जलपाईगुड़ी के मदारीहाट तक देखी जासकती हैं।
केंद्र सरकार की ओर से राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतपरियोजना शुरू की गई थी, इसके मुताबिक न्यूनतम 50 परिवारों या 100 लोगों के वर्जिन मौजा में सभी लोगों को बिजली देने का इंतजाम किया जाएगा। गरीबी सीमारेखा से नीचे (बीपीएल) के लोगों को मुफ्त और दूसरे लोगों को रुपए देकर बिजली मिलेगी। राज्य के 14 जिलों में यह काम वेस्ट बंगाल स्टेट इलेक्ट्रिसिटी डिस्ट्रीब्यूशन कार्पोरेशन की ओर से किया जा रहा है। कोलकाता के अलावा दूसरे जिलों में केंद्र सरकार के तहत चार संस्थाएं यह काम कर रही हैं। एक दशक पहले शुरू हुई परियोजना के दौरान दो हजार करोड़ रुपए की रकम खर्च हो गई है। लेकिन अभी तक राज्य के आधे लोग बिजली की प्रतीक्षा कर रहे हैं। मगराहाट के नैनान गांव के लोगों ने 2007 में बिजली के लिए आवेदन किया था, लेकिन अभी तक बिजली नहीं मिली है, इसलिए वहां लोग बिजली चोरी करने के लिए मजबूर थे।
आंकड़ों की बात करें तो सरकार खुद यह बात मानती है कि राज्य के आधे से ज्यादा 55 फीसदी लोगों के घरों में बिजली नहीं पहुंच सकी है। जबकि पंजाब, हरियाणा, गुजरात और महाराष्ट्र और दक्षिण भारत के चार राज्यों में लगभग 100 फीसद बिजली पहुंच चुकी है। बिजली विभाग के एक अधिकारी के मुताबिक कूचबिहार के 70 फीसद, उ त्तर दिनाजपुर के 70 फीसद, मालदा जिले के 64 फीसद, पुरुलिया के 65 फीसद, मुर्शिदाबाद जिलेके 60 फीसद, जलपाईगुड़ी के 62 फीसद, दक्षिण चौबीस परगना जिले के 55 फीसद, वीरभूम के 53 फीसद, बांकुड़ा के 52 फीसद, पूर्व औरपश्चिमी मेदिनीपुर जिले के 51 फीसद, बर्दवान के 47 फीसद, नदिया के 44 फीसद, उ त्तर चौबीस परगना जिले के 38 फीसद, दार्जिलिंग के 23 फीसद, हुगली के 24 फीसद और हावड़ा जिले के 10 फीसद परिवारों के घर में अभी तक बिजली नहीं पहुंच सकी है। उनका कहना है कि राज्य में ग्रामीण परिवार एक करोड़ 20 लाख है, इसमें 67 लाख परिवारों के घरों में बिजली पहुंच चुकी है।
राज्य के बिजली मंत्री ने विधानसभा में एलान किया था कि राजीव गांधी ग्रामीण विद्युतपरियोजना के तहत 2041 करोड़ 76 लाख रुपए खर्च किए गए हैं और 3933 मौजा में से 3929 मौजा में बिजली पहुंचाने काकाम पूरा हो गया है। हालांकि केंद्रीय सरकार की परियोजना के मुताबिक एक मौजा में 10 फीसद घरों में बिजली कनेक्शन पहुंचने से ही वह इलाका बिजली वितरण का काम पूरा करने में सफल माना जाएगा। इस तरह सरकारी खाते में एक सौ फीसद लोगों को बिजली मिलने का रिकार्ड दर्ज होजाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि महज 10 फीसद लोगों के घरों में बिजली पहुंचने के बाद भी 90 फीसद परिवार अंधेरे में रहते हैं। बिजली विभाग के एक अधिकारी मानते हैं कि राज्य के ग्रामीण इलाकों की हालत ऐसी है कि लोग महीने में 50 रुपएका बिल भारने में भी असमर्थ हैं, ऐसे में बिजली की लाइन लेने से पहले उन्हें सौ बार सोचना पड़ता है।
ऐसे हालत में लोग बिजलीकी चोरी करते हैं। महानगर कोलकाता में भी बिजलीकी चोरी जारी है। इलाके के राजनीतिक दलों और दादाओं की मदद से यहकाम हो रहा है। शहर के 18 फीसद इलाके में चोरी ज्यादा हो रही है। इसमें मेटियाबुर्ज, गार्डेनरीच, तिलजला, नारकुलडांगा, रिपन स्ट्रीट, मेंहदीबगान, इलियट रोड, तपसिया, टेंगरा, लेक गार्डेन, उ त्तर पंचान्न ग्राम, बेहाला के कई इलाके शामिल बताए जाते हैं। सीईएससी के तहत टीटागढ़, हावड़ा, बानतला, कमरहट्टी के वि•िान्न इलाकों में बिजली चोरी की जा रही है। बिजली चोरी आम तौर पर तीन तरह से की जाती है। इसके तहत जमीन के नीचे से, खंबे की तार से तार जोड़ कर व मीटर से की जाती है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि सरकार की ओर से एक संस्था को बिजली आपूर्ति का ठेका दिया गया है, इससे ही समस्याएं हो रही हैं।
हावड़ा जिले के उदयनारायणपुर इलाके में अभी भी कई परिवार बगैर बिजली के रह रहे हैं। नए जमाने में पंखा, बल्ब, टीवी कंप्यूटर के साथ सबसे बड़ी जरूरत मोबाइल फोन चार्ज करना हो गया है। इसके लिए बिजली की जरूरत है। यहां के गढ़ भवानीपुर गांव में पंचायत के उ त्तर चांदचक गांव के नजदीक से बिजली की तार गुजरती है। लेकिन लोगों के घरों में अंधेरा है, इसलिए लोग अभी भी लालटेन के सहारे अंधेरा दूर करने में लगे हैं। यही हालत सांकराईल थाना इलाके के नीमतला इलाके के कई घरों की भी है। महानगर से सटे राज्य से किसी जमाने के शेफिल्ड का जब यह हाल है तो दूसरे इलाकों की तो महज कल्पना ही की जा सकती है।•िान्न इलाकों में बिजली चोरी की जा रही है। बिजली चोरी आम तौर पर तीन तरह से की जाती है। इसके तहत जमीन के नीचे से, खंबे की तार से तार जोड़ कर व मीटर से की जाती है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि सरकार की ओर से एक संस्था को बिजली आपूर्ति का ठेका दिया गया है, इससे ही समस्याएं हो रही हैं।
हावड़ा जिले के उदयनारायणपुर इलाके में अभी भी कई परिवार बगैर बिजली के रह रहे हैं। नए जमाने में पंखा, बल्ब, टीवी कंप्यूटर के साथ सबसे बड़ी जरूरत मोबाइल फोन चार्ज करना हो गया है। इसके लिए बिजली की जरूरत है। यहां के गढ़ भवानीपुर गांव में पंचायत के उ त्तर चांदचक गांव के नजदीक से बिजली की तार गुजरती है। लेकिन लोगों के घरों में अंधेरा है, इसलिए लोग अभी भी लालटेन के सहारे अंधेरा दूर करने में लगे हैं। यही हालत सांकराईल थाना इलाके के नीमतला इलाके के कई घरों की भी है। महानगर से सटे राज्य से किसी जमाने के शेफिल्ड का जब यह हाल है तो दूसरे इलाकों की तो महज कल्पना ही की जा सकती है।न्न इलाकों में बिजली चोरी की जा रही है। बिजली चोरी आम तौर पर तीन तरह से की जाती है। इसके तहत जमीन के नीचे से, खंबे की तार से तार जोड़ कर व मीटर से की जाती है। ज्यादातर लोगों का कहना है कि सरकार की ओर से एक संस्था को बिजली आपूर्ति का ठेका दिया गया है, इससे ही समस्याएं हो रही हैं।
हावड़ा जिले के उदयनारायणपुर इलाके में अभी भी कई परिवार बगैर बिजली के रह रहे हैं। नए जमाने में पंखा, बल्ब, टीवी कंप्यूटर के साथ सबसे बड़ी जरूरत मोबाइल फोन चार्ज करना हो गया है। इसके लिए बिजली की जरूरत है। यहां के गढ़ भवानीपुर गांव में पंचायत के उ त्तर चांदचक गांव के नजदीक से बिजली की तार गुजरती है। लेकिन लोगों के घरों में अंधेरा है, इसलिए लोग अभी भी लालटेन के सहारे अंधेरा दूर करने में लगे हैं। यही हालत सांकराईल थाना इलाके के नीमतला इलाके के कई घरों की भी है। महानगर से सटे राज्य से किसी जमाने के शेफिल्ड का जब यह हाल है तो दूसरे इलाकों की तो महज कल्पना ही की जा सकती है।

माओवादी हमले की आशंका के बावजूद वाममोर्चा नेताओं की सुरक्षा घटाई गई


किशनजीकी मौत के बाद माओवादियों की ओर से हिंसक वारदात की आशंका व्यक्त की जा रही है। इस बीच माओवादी नेताओं की ओर से धमकियां दी जा रही है लेकिन राज्य सरकार ने वाममोर्चा के कई पूर्व मंत्रियों और विधायकों की सुरक्षा व्यवस्था पहले की तुलना में घटा दी है, जबकि कई लोगों की सुरक्षा व्यवस्था समाप्त कर दी गई है। इससे कई लोगों की जान खतरे में पड़ गई है। राज्य सरकारकी ओर से कुल मिलाकर 194 लोगों को विशेष सुरक्षा प्रदान की जा रही है। इसमें मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव भट्टाचार्य को सर्वाधिक जेड प्लस सुरक्षा श्रेणी में रखा गया है। इसके बाद वाई श्रेणी में 89 और एक्स श्रेणी में 99 लोगों को रखा गया है। इसमें खतरे की श्रेणी में 29 लोगों को वाई श्रेणी में शामिल किया गया है।
कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (माकपा) की ओर से वाममोर्चा के नेताओं की सुरक्षा के बारे में तैयार एक रिपोर्ट से इस बात का खुलासा होता है। यह रिपोर्ट साल में दो बार पेश की जाती है। इसमें सुरक्षा व्यवस्था का जायजा लिया जाता है। इससे पता चलता है कि माओवादियों की धमकी के बाद अधिकतम सुरक्षा पाने वाले नेताओं की सुरक्षा या तो खत्म कर दी गई है या इसमें कमी की गई है।
सूत्रों से पता चला है कि राज्य के पूर्व मंत्री जोगेश चंद्र बर्मन को वाममोर्चा सरकार के दौरान वाई श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई थी। लेकिन अब इसे घटा कर एक्स श्रेणी में कर दिया गया है। दूसरी ओर विधानस•ाा के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल हासिम हलीम और उपाध्यक्ष •ाक्ति पदघोष की सुरक्षा हटा ली गई है। इसी तरह राज्य के पूर्व वि त्त मंत्री असीम दासगुप्ता के अलावा विवादग्रस्त मंत्री गौतम देव की सुरक्षा एक्स श्रेणी में परिवर्तित कर दी गई है। यही हालत पूर्व पीडब्लूडी मंत्री क्षिती गोस्वामी की है। सुभ•ााष नस्कर को इसी श्रेणी में रखा गया है। जबकि विश्वनाथ चौधरी, नारायण विश्वास और तपन राय की सुरक्षा व्यवस्था हटानेके बारे में एक प्रस्ताव पारित हो गया है। इसके साथ ही दूसरे कई पूर्व मंत्रियों के बारे में चेतावनी के नहीं मिलने से उनकी सुरक्षा व्यवस्था घटा या समाप्त की जा रही है।
सूत्रों के मुताबिक बांकुड़ा, पुरुलिया और मिदनापुर के जंगल महल इलाके में पूर्व मंत्रियों को एक्स श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की जाएगी। इसके साथ ही इन इलाकों के नव निर्वाचित 14 विधायकों को इसी तरह की सुरक्षा प्रदान की जाएगी। इसके साथ ही देवलीना हेमब्रग, सुकुमार हांसदा, शांतिराम महतो अधिकतम सुरक्षा पाने वाले नेताओं की सूची में शामिल हैं। राज्य में सबसे ज्यादा सुरक्षा मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, पूर्व मुख्यमंत्री बुद्धदेव और केंद्रीय वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी को प्रदान की जा रही है। इन्हें जेड प्लस श्रेणी की सुरक्षा में रखा गया है। इसके साथ ही मुख्यमंत्री की मां गायत्री देवी को अधिकतम सुरक्षा प्रदान करने के तहत वाई श्रेणी में सुरक्षा प्रदान की जा रही है।

Friday, December 2, 2011


 किशनजी की हत्या की गई-सीडीआरओ
  कोलकाता, कोआर्डीनेशन आफ डेमोक्रेटिक राइट्स आर्गेनाइजेशन (सीडीआरओ) का कहना है कि माओवादी नेता किशनजी के बारे में राज्य सरकार का दावा जांच-पड़ताल के बाद किसी भी तरह सेसही नहीं ठहरता है। शुक्रवार को कोलकाता प्रेस क्लब में आयोजित एक संवाददाता सम्मेलन में संगठन के महासचिव देव प्रसाद रायचौधरी, एपीसीएलसी के महासचिव सीएच चंद्रशेखर के अलावा भानू शंकर, गौतम नवलाखा ने यह जानकारी दी। इसके साथ ही संगठन की ओर से मांग की गई है कि उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायधीश या अवकाश प्राप्त न्यायधीश से मामले की स्वतंत्र तौर पर न्यायिक जांच करवाई जाए। इसके साथ ही भारतीय दंड विधान की धारा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज किया जाए।
उन्होंने बताया कि सरकार की ओर से दावा किया गया है कि 24 नवंबर को बुड़ीशोल के जंगल में पुलिस मुकाबले में किशनजी की मौत हो गई है। कहा गया था कि तीन दिन से पुलिस और साझा सुरक्षा बलों ने इलाके को घेरे में ले लिया था और मुकाबला चल रहा था। किशनजी समेत दूसरे लोगों को आत्मसमर्पण करने के लिए माइक पर घोषणा की गई थी। लेकिन जांच पड़ताल से पता चलता है कि यह दावा ठीक नहीं है।
इस दौरान 25 लोगों का एक दल अलग-अलग ग्रूप बनाकर घटनास्थल के आसपास के पांच गांव के 300 लोगों से मिला और पूछताछ की। इसमें सात साल की उम्र के बच्चे से लेकर 70 साल के बुजुर्ग पुरुष-महिलाएं शामिल थे। लेकिन किसी ने भी यह नहीं कहा कि तीन दिन पहले पुलिस ने इलाके की घेराबंदी की थी और वहां किसीतरह का मुकाबला चल रहा था। ज्यादातर लोगों का कहना था कि पुलिस और साझा सुरक्षा बल के जवान 24 नवंबर को गांव में पहुंचे और लोगों को घर से नहीं निकलने की चेतावनी देकर चले गए। इसके बाद विभिन्न लोगों के मुताबिक साढ़े चार बजे से साढ़े पांच बजे के बीच 15 से लेकर 20 मिनट तक गोलियां चलने की आवाज सुनी गई। लेकिन किसी भी गांव वाले ने माइक की आवाज नहीं सुनी जिससे माना जा सके कि किशनजी को आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया हो। इतना ही नहीं घटनास्थल के आसपास के इलाकों में पेड़ों की जांच के दौरान कहीं भी गोलियों के निशान नहीं मिले, जबकि मुकाबले के दौरान चलाई गई गोलियों से पेड़ों पर निशान होने चाहिए थे। इससे साफतौर पर यह लगता है कि सिर्फ 24 अक्तूबर को ही पुलिस वाले वहां पहुंचे थे और 15-30 मिनट तक फायरिंग की गई। यह इच्छाकृत की गई हत्या है इसलिए स्वतंत्र जांच करवाने के साथ ही धारा 302 के तहत हत्या का मामला दर्ज किया जाए।